पास Poetry (page 9)

क्यूँ और ज़ख़्म सीने पे खाओ हो दोस्तो

सुलैमान अहमद मानी

तुम्हें रो कर बताना चाहते हैं

सुहैल सानी

गए मौसमों को भुला देंगे हम

सुहैल अहमद ज़ैदी

निगाहें दर पे लगी हैं उदास बैठे हैं

सूफ़ी तबस्सुम

आँखें खुली थीं सब की कोई देखता न था

सूफ़ी तबस्सुम

इस तरह से तर्जुमानी कर गया

सुबहान असद

रह कर भी तुझ से दूर तिरे आस-पास हूँ

सिया सचदेव

जिस दिन से मिरी तुम से शनासाई हुई है

सिया सचदेव

सनम किस बंद सीं पहुँचूँ तिरे पास

सिराज औरंगाबादी

मुस्कुरा कर आशिक़ों पर मेहरबानी कीजिए

सिराज औरंगाबादी

हमारे पास जानाँ आन पहुँचा

सिराज औरंगाबादी

ग़म ने बाँधा है मिरे जी पे खला हाए खला

सिराज औरंगाबादी

दिलदार की कशिश ने ऐंचा है मन हमारा

सिराज औरंगाबादी

अग़्यार छोड़ मुझ सें अगर यार होवेगा

सिराज औरंगाबादी

आया पिया शराब का प्याला पिया हुआ

सिराज औरंगाबादी

इतना न दूर जाओ कि जीना मुहाल हो

सिरज़ अालम ज़ख़मी

मुर्दा लोगों की तस्वीरी नुमाइश

सिदरा सहर इमरान

प्यासा जो मेरे ख़ूँ का हुआ था सो ख़्वाब था

सिद्दीक़ मुजीबी

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

नावक-ज़नी निगाह की ऐ जान-ए-जाँ है हेच

श्याम सुंदर लाल बर्क़

तकल्लुफ़ छोड़ कर मेरे बराबर बैठ जाएगा

शुजा ख़ावर

दिन के पास कहाँ जो हम रातों में माल बनाते हैं

शुजा ख़ावर

बिछड़ गए थे किसी रोज़ खेल खेल में हम

शोज़ेब काशिर

मैं जब्हा सा हूँ उस दर-ए-आली-मक़ाम का

शोला अलीगढ़ी

वो पास आए आस बने और पलट गए

शोहरत बुख़ारी

वो पास आए आस बने और पलट गए

शोहरत बुख़ारी

कोठे उजाड़ खिड़कियाँ चुप रास्ते उदास

शोहरत बुख़ारी

हासिल-ए-इंतिज़ार कुछ भी नहीं

शोहरत बुख़ारी

गुज़र जाएँगे ये दिन बेबसी के

शोभा कुक्कल

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