पास Poetry (page 11)

एक मुद्दत हुई घर से निकले हुए

शारिक़ कैफ़ी

इक दिन ख़ुद को अपने पास बिठाया हम ने

शारिक़ कैफ़ी

कुछ भी हो उस से जुदाई का सबब घर जाओ

शरीफ़ अहमद शरीफ़

मौसम-ए-संग-ओ-रंग से रब्त-ए-शरार किस को था

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

लग़्ज़िश पा-ए-होश का हर्फ़-ए-जवाज़ ले के हम

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

इधर से देखें तो अपना मकान लगता है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

ख़ुश-कुन ख़बर के धोके में रक्खा गया मुझे

शमशीर हैदर

जब भी तुम्हारी याद की आहट मुझे मिली

शम्स फ़रीदी

फ़रेब-ए-नज़र

शमीम करहानी

क़ैद-ए-ग़म-ए-हयात से हम को छुड़ा लिया

शमीम करहानी

हुजूम-ए-दर्द में ख़ंदाँ है कौन मेरे सिवा

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

अनमोल सही नायाब सही बे-दाम-ओ-दिरम बिक जाते हैं

शमीम करहानी

नीले पीले सियाह सुर्ख़ सफ़ेद सब थे शामिल इसी तमाशे में

शमीम हनफ़ी

आना उसी का बज़्म से जाना उसी का है

शमीम हनफ़ी

शर्मीली छूई-मूई अजब मोहनी सी थी

शमीम फ़ारूक़ी

वो एक शख़्स मिरे पास जो रहा भी नहीं

शमीम अब्बास

हर नफ़स दीदा-ए-दिल में तिरी यादों का हुजूम

शकूर जावेद

लदी है फूलों से फिर भी उदास लगती है

शकील शम्सी

मुझ को तिरे ख़याल से वहशत कभी न थी

शकील जाज़िब

अश्क पीने के लिए ख़ाक उड़ाने के लिए

शकील जमाली

नुमाइश-ए-अलीगढ़

शकील बदायुनी

वो हम से दूर होते जा रहे हैं

शकील बदायुनी

इश्क़ की चिंगारियों को फिर हवा देने लगे

शकील बदायुनी

राज़ में रख तिरी रुस्वाई का क़िस्सा मैं हूँ

शकील आज़मी

मिरे ख़ुलूस की शिद्दत से कोई डर भी गया

शकेब जलाली

मौज-ए-सबा रवाँ हुई रक़्स-ए-जुनूँ भी चाहिए

शकेब जलाली

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर

शकेब जलाली

बस इक शुआ-ए-नूर से साया सिमट गया

शकेब जलाली

ख़ाक से उठना ख़ाक में सोना ख़ाक को बंदा भूल गया

शाइस्ता मुफ़्ती

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