फूल Poetry (page 21)

शाम को सुब्ह अँधेरे को उजाला लिक्खें

साहिर होशियारपुरी

हर एक फूल के दामन में ख़ार कैसा है

साहिर होशियारपुरी

मुझ को वीरान सी रातों में जगाने वाले

साहिबा शहरयार

ख़्वाब देखूँ कोई महताब लब-ए-बाम उतरे

सहबा वहीद

साँप सपेरा और मैं

सहबा अख़्तर

मन के मंदिर में है उदासी क्यूँ

सहर अंसारी

कब तलक हमारी सई-ए-अमल राएगाँ रहे

सग़ीर अहमद सूफ़ी

उस की यादें महकती रहती हैं

सग़ीर अालम

वक़्त की उम्र क्या बड़ी होगी

साग़र सिद्दीक़ी

तारों से मेरा जाम भरो मैं नशे में हूँ

साग़र सिद्दीक़ी

साक़ी की इक निगाह के अफ़्साने बन गए

साग़र सिद्दीक़ी

कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता

साग़र सिद्दीक़ी

चाँदनी को रसूल कहता हूँ

साग़र सिद्दीक़ी

ऐ दिल-ए-बे-क़रार चुप हो जा

साग़र सिद्दीक़ी

सदियों की शब-ए-ग़म को सहर हम ने बनाया

साग़र निज़ामी

दश्त में क़ैस नहीं कोह पे फ़रहाद नहीं

साग़र निज़ामी

हज़ार हम-सफ़रों में सफ़र अकेला है

साग़र मेहदी

उल्टी गंगा

साग़र ख़य्यामी

क्रिकेट मैच

साग़र ख़य्यामी

कहूँ तो क्या मैं कहूँ प्यारी प्यारी आँखों को

साग़र ख़य्यामी

इतना नाराज़ हो क्यूँ उस ने जो पत्थर फेंका

साग़र आज़मी

धूप में ग़म की मिरे साथ जो आया होगा

साग़र आज़मी

जाना जाना जल्दी क्या है इन बातों को जाने दो

सफ़ी लखनवी

दिए कितने अँधेरी उम्र के रस्तों में आते हैं

सफ़दर सिद्दीक़ रज़ी

फिर कोई आ रहा है दिल के क़रीब

सफ़दर मीर

चारों ओर अब फूल ही फूल हैं क्या गिनते हो दाग़ों को

सफ़दर मीर

बहार आई है फिर पैरहन गुलाबी हो

सफ़दर मीर

नज़र में रंग समाए हुए उसी के हैं

सईद क़ैस

हिज्र तन्हाई के लम्हों में बहुत बोलता है

सईद क़ैस

बे-सबब ठीक नहीं घर से निकल कर जाना

सईद आरिफ़ी

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