सबसे Poetry (page 111)

समझता हूँ मैं सब कुछ सिर्फ़ समझाना नहीं आता

अख़्तर अंसारी

तिरा आसमाँ नावकों का ख़ज़ीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना

अख़्तर अंसारी

सुना के अपने ऐश-ए-ताम की रूदाद के टुकड़े

अख़्तर अंसारी

समझता हूँ मैं सब कुछ सिर्फ़ समझाना नहीं आता

अख़्तर अंसारी

पुर-कैफ़ ज़ियाएँ होती हैं पुर-नूर उजाले होते हैं

अख़्तर अंसारी

मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में

अख़्तर अंसारी

यहाँ मौसम भी बदलें तो नज़ारे एक जैसे हैं

अख़्तर अमान

मोहब्बतों में बहुत रस भी है मिठास भी है

अख़्तर अमान

महबूबा और मौत

अख़लाक़ अहमद आहन

हम आज बज़्म-ए-रक़ीबाँ से सुर्ख़-रू आए

अख़लाक़ अहमद आहन

ये सारी धूल मिरी है ये सब ग़ुबार मिरा

अकबर मासूम

ये सारे फूल ये पत्थर उसी से मिलते हैं

अकबर मासूम

मुबहम थे सब नुक़ूश नक़ाबों की धुँद में

अकबर हैदराबादी

बुरे भले में फ़र्क़ है ये जानते हैं सब मगर

अकबर हैदराबादी

सच्चा दिया

अकबर हैदराबादी

सायों से भी डर जाते हैं कैसे कैसे लोग

अकबर हैदराबादी

कुल आलम-ए-वुजूद कि इक दश्त-ए-नूर था

अकबर हैदराबादी

जिन पे अजल तारी थी उन को ज़िंदा करता है

अकबर हैदराबादी

हाँ यही शहर मिरे ख़्वाबों का गहवारा था

अकबर हैदराबादी

फ़ित्ने अजब तरह के समन-ज़ार से उठे

अकबर हैदराबादी

अता हुई किसे सनद नज़र नज़र की बात है

अकबर हैदराबादी

कहा था उस ने मोहब्बत की आबरू रखना

अकबर हमीदी

हरीफ़-ए-गर्दिश-ए-अय्याम तो बने हुए हैं

अकबर हमीदी

हँसी में साग़र-ए-ज़र्रीं खनक खनक जाए

अकबर हमीदी

इक लम्हे ने जीवन-धारा रोक लिया

अकबर हमीदी

लोग कहते हैं बदलता है ज़माना सब को

अकबर इलाहाबादी

इश्वा भी है शोख़ी भी तबस्सुम भी हया भी

अकबर इलाहाबादी

नई तहज़ीब

अकबर इलाहाबादी

मदरसा अलीगढ़

अकबर इलाहाबादी

जल्वा-ए-दरबार-ए-देहली

अकबर इलाहाबादी

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