सबसे Poetry (page 45)

गुरेज़

साहिर लुधियानवी

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो

साहिर लुधियानवी

दीवारों का जंगल जिस का आबादी है नाम

साहिर लुधियानवी

ऐ नई नस्ल

साहिर लुधियानवी

आना है तो आ राह में कुछ फेर नहीं है

साहिर लुधियानवी

लब पे पाबंदी तो है एहसास पर पहरा तो है

साहिर लुधियानवी

भूले से मोहब्बत कर बैठा, नादाँ था बेचारा, दिल ही तो है

साहिर लुधियानवी

अब कोई गुलशन न उजड़े अब वतन आज़ाद है

साहिर लुधियानवी

सदा-ए-जावेदाँ

साहिर होशियारपुरी

टालने से वक़्त क्या टलता रहा

साहिर होशियारपुरी

निशाँ इल्म-ओ-अदब का अब भी है उजड़े दयारों में

साहिर देहल्वी

मस्त-ए-निगाह-ए-नाज़ का अरमाँ निकालिए

साहिर देहल्वी

जो ला-मज़हब हो उस को मिल्लत-ओ-मशरब से क्या मतलब

साहिर देहल्वी

इस जिस्म की है पाँच अनासिर से बनावट

साहिर देहल्वी

दिल है बहर-ए-बे-कराँ दिल की उमंग

साहिर देहल्वी

बाँध के सफ़ हों सब खड़े तेग़ के साथ सर झुके

साहिर भोपाली

क्या परिंदे लौट कर आए नहीं

साहिल अहमद

नींद इन आँखों में बन कर आए कोई

साहिबा शहरयार

अहबाब भी हैं ख़ूब कि तश्हीर कर गए

सहबा वहीद

मुझे मिला वो बहारों की सरख़ुशी के साथ

सहबा अख़्तर

अलाव

सहर अंसारी

इक आस का धुँदला साया है इक पास का तपता सहरा है

सहर अंसारी

हर अंजुमन में दावा-ए-वहशत किया करो

सग़ीर अहमद सूफ़ी

वो हक़ीक़त में एक लम्हा था

सग़ीर मलाल

ख़ुद से निकलूँ तो अलग एक समाँ होता है

सग़ीर मलाल

ख़ाक में मिलती हैं कैसे बस्तियाँ मालूम हो

सग़ीर मलाल

जिसे सुनाओगे पहले ही सुन चुका होगा

सग़ीर मलाल

फ़क़त ज़मीन से रिश्ते को उस्तुवार किया

सग़ीर मलाल

अलग हैं हम कि जुदा अपनी रह-गुज़र में हैं

सग़ीर मलाल

वो जो मुझ से मिलता नहीं

सग़ीर अालम

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