सबसे Poetry (page 47)

मिरा महबूब सब का मन हरन है

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

ये क्या हुआ कि हर इक रस्म-ओ-राह तोड़ गए

सादिक़ इंदौरी

अल्फ़ाज़ अल्फ़ाज़ ही हैं

सादिक़

रास्ते फैले हुए जितने भी थे पत्थर के थे

सदफ़ जाफ़री

आग थी ऐसी कि अरमाँ जल गए

सदफ़ जाफ़री

नींद आई ही नहीं हम को न पूछो कब से

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

दिखाएगी असर दिल की पुकार आहिस्ता आहिस्ता

सदा अम्बालवी

इक चेहरे पर रोज़ गुज़ारा होता है

सचिन शालिनी

यहाँ जो पेड़ थे अपनी जड़ों को छोड़ चुके

साबिर ज़फ़र

तन्हाई तामीर करेगी घर से बेहतर इक ज़िंदान

साबिर ज़फ़र

सब सितम याद हैं सारी हमदर्दियाँ याद हैं

साबिर ज़फ़र

क़िस्मत में अगर जुदाइयाँ हैं

साबिर ज़फ़र

किसी तौर हो न पिन्हाँ तिरा रंग-ए-रू-सियाही

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

जीने का दरस सब से जुदा चाहिए मुझे

साबिर ज़फ़र

राह में शहर-ए-तरब याद आया

साबिर वसीम

लोगो ये अजीब सानेहा है

साबिर वसीम

खिले हुए हैं फूल सितारे दरिया के उस पार

साबिर वसीम

जो ख़्वाब मेरे नहीं थे मैं उन को देखता था

साबिर वसीम

तेरी याद मेरी भूल

साबिर दत्त

सैंत कर ईमान कुछ दिन और रखना है अभी

साबिर

अख़ीर-ए-शब सर्द राख चूल्हे की झाड़ लाएँ

साबिर

अगर नहीं है इजाज़त सवाल मत करना

सबीहा सबा, पाकिस्तान

बे-ख़याली में तख़्लीक़

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

बस अना को बहाल रखना है

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

अदाकार चेहरे

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

अगर अल्फ़ाज़ से ग़म का इज़ाला हो गया होता

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

ज़िंदगानी हँस के तय अपना सफ़र कर जाएगी

सबा इकराम

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