सबसे Poetry (page 48)

अच्छा हुआ कि सब दर-ओ-दीवार गिर पड़े

सबा अकबराबादी

उस का वादा ता-क़यामत कम से कम

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

आईना बन जाइए जल्वा-असर हो जाइए

सबा अकबराबादी

मौत इक दरिंदा है ज़िंदगी बला सी है

सादुल्लाह शाह

कैफ़-ए-सुरूर-ओ-सोज़ के क़ाबिल नहीं रहा

एस ए मेहदी

जब न तब सुनिए तो करता है वो इक़रार बग़ैर

राय सरब सुख दिवाना

यूँ आज अपने-आप से उलझा हुआ हूँ मैं

रूही कंजाही

शुऊर-ए-इश्क़ अगर फ़ितरत-ए-निगाह में है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

जब कि सारी काएनात उस की निगहबानी में है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

तुम्हारी याद तुम्हारा ख़याल काफ़ी है

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

था निगाहों में बसाया जाने किस तस्वीर को

रिज़वानूरर्ज़ा रिज़वान

दिल जो घबराया तो उठ कर दोस्तों में आ गया

रियाज़ साग़र

वीरान ख़्वाहिश

रियाज़ लतीफ़

एक रोते हुए आदमी को देख कर

रियाज़ लतीफ़

बनारस

रियाज़ लतीफ़

नया अदम कोई नई हदों का इंतिख़ाब अब

रियाज़ लतीफ़

मिरे सिमटे लहू का इस्तिआरा ले गया कोई

रियाज़ लतीफ़

किनारा-दर-किनारा मुस्तक़िल मंजधार है यूँ भी

रियाज़ लतीफ़

हदों के न होने की ज़िल्लत से हारे हुए

रियाज़ लतीफ़

ये क़ैस-ओ-कोहकन के से फ़साने बन गए कितने

रियाज़ ख़ैराबादी

शेर-ए-तर मेरे छलकते हुए साग़र हैं 'रियाज़'

रियाज़ ख़ैराबादी

किसी का हंस के कहना मौत क्यूँ आने लगी तुम को

रियाज़ ख़ैराबादी

हम को 'रियाज़' जानते हैं मानते हैं सब

रियाज़ ख़ैराबादी

ये सीधे जो अब ज़ुल्फ़ों वाले हुए हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

ये गवारा कि मिरा दस्त-ए-तमन्ना बाँधे

रियाज़ ख़ैराबादी

उस हुस्न का शैदा हूँ उस हुस्न का दीवाना

रियाज़ ख़ैराबादी

सितम-ए-ना-रवा को रोते हैं

रियाज़ ख़ैराबादी

'रियाज़' इक चुलबुला सा दिल हो हम हों

रियाज़ ख़ैराबादी

नहीं छुपता तिरे इ'ताब का रंग

रियाज़ ख़ैराबादी

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