सबसे Poetry (page 50)

मैं कार-आमद हूँ या बे-कार हूँ मैं

रहमान फ़ारिस

उस का चेहरा भी सुनाता है कहानी उस की

रेहाना क़मर

हसीन दुनिया उजड़ गई तो

रेहान अल्वी

हमारे अज़ाबों का क्या पूछते हैं

रज़्ज़ाक़ अरशद

यूँ खुले बंदों मोहब्बत का न चर्चा करना

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

शहर अपना है मगर लोग कहाँ हैं अपने

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

हर दिन जिस पर फूल खिलें वो बे-मौसम की डाल नहीं मैं

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

इक सहीफ़ा नया उतरा है सुना है लोगो

रज़िया फ़सीह अहमद

दिल के दर्द के कम होने का तन्हा कुछ सामान हुआ

रज़िया फ़सीह अहमद

काश पड़ते न इन अज़ाबों में

रज़ी रज़ीउद्दीन

दर्द-ओ-ग़म सब सुनाने बैठे हैं

रज़ी रज़ीउद्दीन

हक़ीक़तों का पता दे के ख़ुद सराब हुआ

रज़ी मुजतबा

यूँ तो लिखने के लिए क्या नहीं लिक्खा मैं ने

राज़ी अख्तर शौक़

फिर जो देखा दूर तक इक ख़ामुशी पाई गई

राज़ी अख्तर शौक़

जिस ने बनाया हर आईना मैं ही था

राज़ी अख्तर शौक़

छेड़ के साज़-ए-ज़रगरी ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है रक़्स में

राज़ी अख्तर शौक़

मुहक़क़िक़

रज़ा नक़वी वाही

घर की रौनक़

रज़ा नक़वी वाही

ये किस दयार के हैं किस के ख़ानदान से हैं

रज़ा मौरान्वी

वो आँसू जो हँस हँस के हम ने पिए हैं

रज़ा लखनवी

वास्ता कोई न रख कर भी सितम ढाते हो तुम

रज़ा लखनवी

चढ़ते हुए दरिया की अलामत नज़र आए

रज़ा हमदानी

सुनते तो थे 'रज़ा' हैं सब हैं बड़े मुसलमाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

क्या कहें अपनी सियह-बख़्ती ही का अंधेर है

रज़ा अज़ीमाबादी

ज़ुल्फ़ खोले था कहाँ अपनी वो फिर बेबाक रात

रज़ा अज़ीमाबादी

उस घड़ी कुछ थे और अब कुछ हो

रज़ा अज़ीमाबादी

टुक तू महमिल का निशाँ दे जल्द ऐ सूरत ज़रा

रज़ा अज़ीमाबादी

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

मौत भी आती नहीं हिज्र के बीमारों को

रज़ा अज़ीमाबादी

किस लिए सहरा के मुहताज-ए-तमाशा होजिए

रज़ा अज़ीमाबादी

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