सबसे Poetry (page 51)

इश्क़ की बीमारी है जिन को दिल ही दिल में गलते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

आरज़ू-ए-विसाल में सब हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

हूँ शामिल सब में और सब से जुदा हूँ

रज़ा अमरोही

बुतान-ए-शहर को ये ए'तिराफ़ हो कि न हो

रविश सिद्दीक़ी

उस से बढ़ कर तो कोई बे-सर-ओ-सामाँ न मिला

रविश सिद्दीक़ी

सुकूँ है हमनवा-ए-इज़्तिराब आहिस्ता आहिस्ता

रविश सिद्दीक़ी

नक़ाब-ए-शब में छुप कर किस की याद आई समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

ख़िरद को गुमशुदा-ए-कू-ब-कू समझते हैं

रविश सिद्दीक़ी

कहने को सब फ़साना-ए-ग़ैब-ओ-शुहूद था

रविश सिद्दीक़ी

हुस्न-ए-असनाम ब-हर-लम्हा फ़ुज़ूँ है कि नहीं

रविश सिद्दीक़ी

हवस-ए-ख़लवत-ए-ख़ुर्शीद-ओ-निशाँ और सही

रविश सिद्दीक़ी

एक लग़्ज़िश में दर-ए-पीर-ए-मुग़ाँ तक पहुँचे

रविश सिद्दीक़ी

बादा-ए-गुल को सब अंदोह-रुबा कहते हैं

रविश सिद्दीक़ी

अफ़्लाक गूँगे हैं

रविश नदीम

है ज़ेर-ए-ज़मीं साया तो बाला-ए-ज़मीं धूप

रौनक़ टोंकवी

ठोकरों की शय परस्तिश की नज़र तक ले गए

रौनक़ रज़ा

भूली-बिसरी ख़्वाहिशों का बोझ आँखों पर न रख

रौनक़ रज़ा

सब होत न होत से नथरी हुई आसान ग़ज़ल हूँ छा के सुनो

रउफ़ रज़ा

बहुत ख़ूबियाँ हैं हवस-कार दिल में

रउफ़ रज़ा

उमूद हो के उफ़ुक़ में बदल रहे हैं सुतून

रउफ़ ख़लिश

सिलसिले ये कैसे हैं टूट कर नहीं मिलते

रउफ़ ख़लिश

ज़िंदगी एहसान ही से मावरा थी मैं न था

रऊफ़ ख़ैर

गिरफ़्तारी के सब हरबे शिकारी ले के निकला है

रऊफ़ ख़ैर

घर से निकल के आए हैं बाज़ार के लिए

रसूल साक़ी

न जाने कब बसर हुए न जाने कब गुज़र गए

रशक खलीली

रौशनी बन के अँधेरे पे असर हम ने किया

राशिद तराज़

रात आख़िर हो सितम-पेशों पे ऐसा भी नहीं

राशिद तराज़

आँखों आँखों में मोहब्बत का पयाम आ ही गया

रशीद शाहजहाँपुरी

दर जो खोला है कभी उस से शनासाई का

राशिद नूर

वो जो ख़ुद अपने बदन को साएबाँ करता नहीं

राशिद मुफ़्ती

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