सबसे Poetry (page 53)

'मीर'-जी से अगर इरादत है

रसा चुग़ताई

मैं ने सोचा था इस अजनबी शहर में ज़िंदगी चलते-फिरते गुज़र जाएगी

रसा चुग़ताई

हर इक दरवेश का क़िस्सा अलग है

रसा चुग़ताई

मेरी ईज़ा में ख़ुशी जब आप की पाते हैं लोग

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

हम जूँ चकोर ग़श हैं अजी एक यार पर

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

चाह कर हम उस परी-रू को जो दीवाने हुए

रंगीन सआदत यार ख़ाँ

सब की आँखें तो खुली हैं देखता कोई नहीं

राणा गन्नौरी

भला कह दिया या बुरा कह दिया

राणा गन्नौरी

होता है मेहरबान कहाँ पर ख़ुदा-ए-इश्क़

राना आमिर लियाक़त

लहकती लहरों में जाँ है किनारे ज़िंदा हैं

राम रियाज़

लफ़्ज़ बे-जाँ हैं मिरे रूह-ए-मआनी मुझे दे

राम रियाज़

किस ने कहा था शहर में आ कर आँख लड़ाओ दीवारों से

राम प्रकाश राही

काश मेरे डूबने का वो भी मंज़र देखता

राम नाथ असीर

क्या ग़ज़ब है कि मुलाक़ात का इम्काँ भी नहीं

राम कृष्ण मुज़्तर

बे-दीन हुए ईमान दिया हम इश्क़ में सब कुछ खो बैठे

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

हसीं तुझ से तिरा हुस्न-ए-तलब था

राम अवतार गुप्ता मुज़्तर

माज़ी से उभरीं वो ज़िंदा तस्वीरें

राजेन्द्र मनचंदा बानी

नफ़ी सारे हिसाबों की

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हर्फ़-ए-ग़ैर

राजेन्द्र मनचंदा बानी

हर जाद-ए-शहर

राजेन्द्र मनचंदा बानी

तीरगी बला की है मैं कोई सदा लगाऊँ

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सफ़र है मिरा अपने डर की तरफ़

राजेन्द्र मनचंदा बानी

सदा-ए-दिल इबादत की तरह थी

राजेन्द्र मनचंदा बानी

रही न यारो आख़िर सकत हवाओं में

राजेन्द्र मनचंदा बानी

पैहम मौज-ए-इमकानी में

राजेन्द्र मनचंदा बानी

न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मुझ से इक इक क़दम पर बिछड़ता हुआ कौन था

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मोड़ था कैसा तुझे था खोने वाला मैं

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मेहराब न क़िंदील न असरार न तमसील

राजेन्द्र मनचंदा बानी

मस्त उड़ते परिंदों को आवाज़ मत दो कि डर जाएँगे

राजेन्द्र मनचंदा बानी

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