सबसे Poetry (page 52)
शहर-ए-ग़फ़लत के मकीं वैसे तो कब जागते हैं
राशिद मुफ़्ती
एक बीमार सुब्ह
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
आख़िरी नज़्म
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
भले दिन आएँ तो आने वाले बुरे दिनों का ख़याल रखना
राशिद जमाल फ़ारूक़ी
आँख खुली तो मुझ को ये इदराक हुआ
राशिद हामिदी
मुसाहिबत का कोई सिलसिला नहीं है क्या
राशिद अनवर राशिद
ज़ाद-ए-सफ़र
राशिद आज़र
उफ़ुक़ के उस पार
राशिद आज़र
तजज़िया
राशिद आज़र
रात के साए
राशिद आज़र
ज़िंदगी जो कह न पाई रह गई
राशिद आज़र
मालूम है वो मुझ से ख़फ़ा है भी नहीं भी
राशिद आज़र
दर्द अपना था तो इस दर्द को ख़ुद सहना था
राशिद आज़र
चाँद तन्हा है कहकशाँ तन्हा
रशीदुज़्ज़फ़र
सर-ता-पा हैरत में गुम हो जाएगा
राशिदा माहीन मलिक
इक ख़याल-अफ़रोज़ मौज आई तो थी
राशिदा माहीन मलिक
मिरा नाम क़ैस क्यूँ कर तिरे नाम तक न पहुँचे
रशीद रामपुरी
कहते हो मुझे बे-अदब ख़ैर मैं बे-अदब सही
रशीद रामपुरी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
कुछ साए से हर लहज़ा किसी सम्त रवाँ हैं
रशीद क़ैसरानी
ज़ात के कमरे में बैठा हूँ मैं खिड़की खोल कर
रशीद निसार
उक़्दे उल्फ़त के सब ऐ रश्क-ए-क़मर खोल दिए
रशीद लखनवी
ठहर जावेद के अरमाँ दिल-ए-मुज़्तर निकलते हैं
रशीद लखनवी
जिस को आदत वस्ल की हो हिज्र से क्यूँकर बने
रशीद लखनवी
दिल हमारा जानिब-ए-ज़ुल्फ़-ए-सियह-फ़ाम आएगा
रशीद लखनवी
दम-ए-रफ़्तार-ए-जानाँ ये सदा-ए-नाज़ आती है
रशीद लखनवी
बढ़ा ये शक कि ग़ैरों कि तन में आग लगी
रशीद लखनवी
हिरास है ये अज़ल का कि ज़िंदगी क्या है
रशीद कौसर फ़ारूक़ी
'रसा' को दिल में रखते हैं 'रसा' के जानने वाले
रसा रामपुरी
आने को नज़र में मिरी सौ फ़ित्ना-गर आए
रसा रामपुरी
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