सबसे Poetry (page 69)

रानाई-ए-बहार पे थे सब फ़रेफ़्ता

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

न बेताबी न आशुफ़्ता-सरी है

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

और ऐ चश्म-ए-तरब बादा-ए-गुलफ़ाम अभी

हबीब अहमद सिद्दीक़ी

तमाम रात बुझेंगे न मेरे घर के चराग़

हबाब तिर्मिज़ी

अब्र-पारा हूँ कोई दम में चला जाऊँगा

ज्ञान चंद जैन

ज़ाहिर मुसाफ़िरों का हुनर हो नहीं रहा

गुलज़ार बुख़ारी

ज़ाब्ते और ही मिस्दाक़ पे रक्खे हुए हैं

गुलज़ार बुख़ारी

तिरी तलब ने फ़लक पे सब के सफ़र का अंजाम लिख दिया है

गुलज़ार बुख़ारी

आईने का मुँह भी हैरत से खुला रह जाएगा

गुलज़ार बुख़ारी

आप ने औरों से कहा सब कुछ

गुलज़ार

उर्दू ज़बाँ

गुलज़ार

सिद्धार्थ की एक रात

गुलज़ार

किताबें

गुलज़ार

ख़ुदा

गुलज़ार

ज़िक्र आए तो मिरे लब से दुआएँ निकलें

गुलज़ार

फूलों की तरह लब खोल कभी

गुलज़ार

जब भी ये दिल उदास होता है

गुलज़ार

हम तो कितनों को मह-जबीं कहते

गुलज़ार

ये दिल ही जल्वा-गाह है उस ख़ुश-ख़िराम का

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

उस शोख़ से क्या कीजिए इज़्हार-ए-तमन्ना

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

शजर बाग़-ए-जहाँ का था जहाँ तक सब समर लाया

ग़ुलाम यहया हुज़ूर अज़ीमाबादी

कितने दरिया इस नगर से बह गए

गुलाम जीलानी असग़र

अब के बाज़ार में ये तुर्फ़ा तमाशा देखा

गुलाम जीलानी असग़र

जफ़ा-ए-दिल-शिकन

ग़ुलाम दस्तगीर मुबीन

तूफ़ान समुंदर के न दरिया के भँवर देख

गुहर खैराबादी

मुँह ढाँप के मैं जो रो रहा हूँ

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

क्यूँकर न ख़ुश हो सर मिरा लटक्का के दार में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

दुआएँ माँगीं हैं मुद्दतों तक झुका के सर हाथ उठा उठा कर

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

शख़्सियत उस ने चमक-दार बना रक्खी है

गोविन्द गुलशन

हवा के हाथ में ख़ंजर है और सब चुप हैं

गोविन्द गुलशन

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