यात्रा Poetry (page 61)
जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं
अनवर महमूद खालिद
उसे यादों में जब लाना मुसलसल कर दिया मैं ने
अनुभव गुप्ता
हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे
अंजुम तराज़ी
दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा
अंजुम सिद्दीक़ी
इंहिराफ़
अंजुम सलीमी
इस से आगे तो बस ला-मकाँ रह गया
अंजुम सलीमी
दिन ले के जाऊँ साथ उसे शाम कर के आऊँ
अंजुम सलीमी
ज़िंदगी अपनी क़रीने से बसर होती नहीं
अंजुम नियाज़ी
मिरी आवाज़ सुन कर ज़िंदगी बेदार हो जैसे
अंजुम नियाज़ी
किस ने दी मुझ को सदा कौन-ओ-मकाँ के उस तरफ़
अंजुम नियाज़ी
ज़मीं की गोद में इतना सुकून था 'अंजुम'
अंजुम ख़लीक़
क्या जानें सफ़र ख़ैर से गुज़रे कि न गुज़रे
अंजुम ख़लीक़
ये कैसी बात मिरा मेहरबान भूल गया
अंजुम ख़लीक़
हम अपने ज़ौक़-ए-सफ़र को सफ़र सितारा करें
अंजुम ख़लीक़
चाहे तू शौक़ से मुझे वहशत-ए-दिल शिकार कर
अंजुम ख़लीक़
बीते हुए लम्हात को पहचान में रखना
अंजुम ख़लीक़
तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया
अंजुम इरफ़ानी
धूप आती नहीं रुख़ अपना बदल कर देखें
अंजुम इरफ़ानी
बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का
अंजुम इरफ़ानी
और कुछ याद नहीं अब से न तब से पूछो
अंजुम इरफ़ानी
अब किसी अंधे सफ़र के लिए तय्यार हुआ चाहता है
अंजुम इरफ़ानी
ख़याल जान से बढ़ कर सफ़र में रहता है
अंजुम बाराबंकवी
मेरी दुनिया में अभी रक़्स-ए-शरर होता है
अंजुम आज़मी
कीजिए हुनर का ज़िक्र क्या आबरू-ए-हुनर नहीं
अनीस देहलवी
एक नज़्म
अनीस नागी
मिरा हर तीर निशाने पे न पहुँचा आख़िर
अनीस अंसारी
जहाँ दर था वहाँ दीवार क्यूँ है
अनीस अंसारी
इस शहर के लोग अजीब से हैं अब सब ही तुम्हारे असीर हुए
अनीस अंसारी
नज़र मिलते ही साक़ी से गिरी इक बर्क़ सी दिल पर
अनीस अहमद अनीस
तुम जल्वा दिखाओ तो ज़रा पर्दा-ए-दर से
अमजद नजमी
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