सामने Poetry (page 11)

हर एक फूल के दामन में ख़ार कैसा है

साहिर होशियारपुरी

जब सामने की बात ही उलझी हुई मिले

सग़ीर मलाल

एक रहने से यहाँ वो मावरा कैसे हुआ

सग़ीर मलाल

तारों से मेरा जाम भरो मैं नशे में हूँ

साग़र सिद्दीक़ी

मेरे तसव्वुरात हैं तहरीरें इश्क़ की

साग़र सिद्दीक़ी

सावन की रुत आ पहुँची काले बादल छाएँगे

साग़र निज़ामी

उस्ताद मर गए

साग़र ख़य्यामी

गिर्या-ए-शैताँ

साग़र ख़य्यामी

दुम

साग़र ख़य्यामी

लोहे का लिबास

सईदुद्दीन

अलग अलग इकाइयाँ

सईदुद्दीन

काला मोतिया

सईद नक़वी

ये इंतिहा-ए-जुनूँ है कि ग़ैर ही सा लगा

सादिक़ इंदौरी

महक रहा है बदन सारा कैसी ख़ुशबू है

सादिक़ इंदौरी

अल्फ़ाज़ की विलादत

सादिक़

देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है

साबिर वसीम

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

इन पत्थरों के शहर में दिल का गुज़र कहाँ

सबा इकराम

उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें

सबा अकबराबादी

अजल होती रहेगी इश्क़ कर के मुल्तवी कब तक

सबा अकबराबादी

हक़-ओ-नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना

साइल देहलवी

यूँ आज अपने-आप से उलझा हुआ हूँ मैं

रूही कंजाही

मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या

रूही कंजाही

रू-ए-ज़मीं नहीं कि सर-ए-आसमाँ नहीं

रोहित सोनी ‘ताबिश’

मय रहे मीना रहे गर्दिश में पैमाना रहे

रियाज़ ख़ैराबादी

गुलों के पर्दे में शक्लें हैं मह-जबीनों की

रियाज़ ख़ैराबादी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

फिर तुम रुख़-ए-ज़ेबा से नक़ाब अपने उठा दो

रिफ़अत सेठी

जो सोचता हूँ अगर वो हवा से कह जाऊँ

रियाज़ मजीद

जब अगले साल यही वक़्त आ रहा होगा

रियाज़ मजीद

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