मामला Poetry (page 21)

रास्तों में इक नगर आबाद है

सहर अंसारी

वो बुलाएँ तो क्या तमाशा हो

साग़र सिद्दीक़ी

हर मरहला-ए-शौक़ से लहरा के गुज़र जा

साग़र सिद्दीक़ी

बरगश्ता-ए-यज़्दान से कुछ भूल हुई है

साग़र सिद्दीक़ी

उल्टी गंगा

साग़र ख़य्यामी

पस-ए-रौशनी

साग़र ख़य्यामी

शाम के आसार गीले हैं बहुत

सईद क़ैस

खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया

सईद अहमद

मिरा महबूब सब का मन हरन है

सदरुद्दीन मोहम्मद फ़ाएज़

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

हर शख़्स को ऐसे देखता हूँ

सादिक़ नसीम

गुज़रे हैं तेरे साथ जो दिन-रात अभी तक

सादिक़ा फ़ातिमी

दिल के कहने पर चल निकला

सदा अम्बालवी

कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना

सचिन शालिनी

दूर तक एक ख़ला है सो ख़ला के अंदर

साबिर ज़फ़र

नज़र से दूर हैं दिल से जुदा न हम हैं न तुम

साबिर ज़फ़र

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

काम इतनी ही फ़क़त राहगुज़र आएगी

साबिर ज़फ़र

हर एक मरहला-ए-दर्द से गुज़र भी गया

साबिर ज़फ़र

इक आग देखता था और जल रहा था मैं

साबिर वसीम

आज की रात

साबिर दत्त

क्यूँ ढूँढती रहती हूँ उसे सारे जहाँ में

सबा नुसरत

हो गई सारी पशेमानी अबस

सबा जायसी

क़तरा क़तरा तिश्नगी

सबा इकराम

कसरत-ए-जल्वा को आईना-ए-वहदत समझो

सबा अकबराबादी

जो देखिए तो करम इश्क़ पर ज़रा भी नहीं

सबा अकबराबादी

अश्क-बारी नहीं फ़ुर्क़त में शरर-बारी है

सबा अकबराबादी

हक़-ओ-नाहक़ जलाना हो किसी को तो जला देना

साइल देहलवी

वो भी बिगड़ा, हुई रुस्वाई भी

सादुल्लाह शाह

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