तस्वीर Poetry (page 8)

जहाँ में मंज़िल-ए-मक़्सूद ढूँडने वाले

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

उठीं आँखें अगर आहट सुनी है

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

हिज्र की रात मिरी जाँ पे बनी हो जैसे

शहज़ाद अहमद

चुप के आलम में वो तस्वीर सी सूरत उस की

शहज़ाद अहमद

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

शहज़ाद अहमद

कल शाम

शहराम सर्मदी

हवा के हौसले ज़ंजीर करना चाहता है

शहनाज़ नूर

तेरी मर्ज़ी के ख़द-ओ-ख़ाल में ढलता हुआ मैं

शाहिद ज़की

अब तिरी याद से वहशत नहीं होती मुझ को

शाहिद ज़की

एक इक मौज को सोने की क़बा देती है

शाहिद लतीफ़

सोच रहा है इतना क्यूँ ऐ दस्त-ए-बे-ताख़ीर निकाल

शाहिद कमाल

जो मिरी पुश्त में पैवस्त है उस तीर को देख

शाहिद कमाल

रूह को क़ैद किए जिस्म के हालों में रहे

शाहिद कबीर

फिर उसी शोख़ की तस्वीर उतर आई है

शाहिद इश्क़ी

जो तुम से मिला होगा जो तुम ने दिया होगा

शाहिद ग़ाज़ी

ज़रूरत क्या है

शाहीन मुफ़्ती

चेहरों में नज़र आएँ आँखों में उतर जाएँ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

नक़्श करता रम-ओ-रफ़्तार इनाँ-गीर को मैं

शाहीन अब्बास

मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है

शाहीन अब्बास

मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है

शाहीन अब्बास

ख़ुद में उतरें तो पलट कर वापस आ सकते नहीं

शाहीन अब्बास

सफ़र का एक नया सिलसिला बनाना है

शहबाज़ ख़्वाजा

हवस-ए-ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर लिए बैठे हैं

शहाब जाफ़री

मैं ज़ोफ़ से जूँ नक़्श-ए-क़दम उठ नहीं सकता

शाह नसीर

ख़ानदान-ए-क़ैस का मैं तो सदा से पीर हूँ

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

किसी के हाथ पर तहरीर होना

शफ़ीक़ सलीमी

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