सभ्यता Poetry (page 3)

आ के अब जंगल में ये उक़्दा खुला

सलीम अहमद

तसलसुल

सलाम मछली शहरी

अवाम

सलाम मछली शहरी

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

पूछो मुझे ऐ हम-नफ़साँ कौन हूँ क्या हूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

कहाँ ज़मीं के ज़ईफ़ ज़ीने पे चल रही है

सज्जाद बलूच

जो तिरे पहलू में गुज़री ज़िंदगी अच्छी लगी

साहिर शेवी

मुझे सोचने दे

साहिर लुधियानवी

मादाम

साहिर लुधियानवी

लोग औरत को फ़क़त जिस्म समझ लेते हैं

साहिर लुधियानवी

'गाँधी' हो या 'ग़ालिब' हो

साहिर लुधियानवी

ऐ शरीफ़ इंसानो

साहिर लुधियानवी

आज

साहिर लुधियानवी

तोड़ लेंगे हर इक शय से रिश्ता तोड़ देने की नौबत तो आए

साहिर लुधियानवी

सज़ा का हाल सुनाएँ जज़ा की बात करें

साहिर लुधियानवी

टालने से वक़्त क्या टलता रहा

साहिर होशियारपुरी

अल्फ़ाज़ अल्फ़ाज़ ही हैं

सादिक़

उन्हें न तोलिये तहज़ीब के तराज़ू में

सदा अम्बालवी

चलो कि हम भी ज़माने के साथ चलते हैं

सदा अम्बालवी

वो आलम तिश्नगी का है सफ़र आसाँ नहीं लगता

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

मिरे सिमटे लहू का इस्तिआरा ले गया कोई

रियाज़ लतीफ़

चाँद वीरान है सदियों से मिरे दिल की तरह

रिफ़अत सरोश

ज़िंदगी अब इस क़दर सफ़्फ़ाक हो जाएगी क्या

रज़ा मौरान्वी

वो शख़्स अपनी जगह है मुरक़्क़ा-ए-तहज़ीब

रविश सिद्दीक़ी

उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है

रविश सिद्दीक़ी

वो निकहत-ए-गेसू फिर ऐ हम-नफ़साँ आई

रविश सिद्दीक़ी

शिकस्त-ए-रंग-ए-तमन्ना को अर्ज़-ए-हाल कहूँ

रविश सिद्दीक़ी

लगी है भीड़ बड़ा मय-कदे का नाम भी है

रविश सिद्दीक़ी

कौन कहता मुझे शाइस्ता-ए-तहज़ीब-ए-जुनूँ

रविश सिद्दीक़ी

हुस्न-ए-असनाम ब-हर-लम्हा फ़ुज़ूँ है कि नहीं

रविश सिद्दीक़ी

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