विसाल Poetry (page 6)

कभी ज़ुहूर में आ जा कमाल होने दे

साइम जी

आए थे उन के साथ नज़ारे चले गए

सैफ़ुद्दीन सैफ़

शब-ए-सुरूर नई दास्ताँ विसाल-ओ-फ़िराक़

सहबा वहीद

मुझ पे ऐसा कोई शे'र नाज़िल न हो

सहबा अख़्तर

कुल जहाँ इक आईना है हुस्न की तहरीर का

सहबा अख़्तर

दोहराऊँ क्या फ़साना-ए-ख़्वाब-ओ-ख़याल को

सहबा अख़्तर

हवस ओ वफ़ा की सियासतों में भी कामयाब नहीं रहा

सहर अंसारी

हैरत से तक रहा है जहान-ए-वफ़ा मुझे

साग़र निज़ामी

मोहब्बतों में भी माल-ओ-मनाल माँगते हैं

सफ़दर सलीम सियाल

मुसव्विर अपने तसव्वुर का ढूँढता है दवाम

सईदुल ज़फर चुग़ताई

नज़र में रंग समाए हुए उसी के हैं

सईद क़ैस

ग़म रात-दिन रहे तो ख़ुशी भी कभी रही

सईद अख़्तर

वही ख़राबा-ए-इम्काँ वही सिफ़ाल-ए-क़दीम

सईद अहमद

पत्थर को पूजते थे कि पत्थर पिघल पड़ा

सईद अहमद

खुलता है यूँ हवा का दरीचा समझ लिया

सईद अहमद

यूँ तो इक उम्र साथ साथ हुई

सदा अम्बालवी

रात को ख़्वाब हो गई दिन को ख़याल हो गई

साबिर ज़फ़र

क़िस्मत में अगर जुदाइयाँ हैं

साबिर ज़फ़र

मोहब्बतें थीं कुछ ऐसी विसाल हो के रहा

साबिर ज़फ़र

इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ

साबिर वसीम

इदराक ही मुहाल है ख़्वाब-ओ-ख़याल का

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

हज़ार रंग जलाल-ओ-जमाल के देखे

रूही कंजाही

हवा-ए-जिंदगी भी कूचा-ए-क़ातिल से आती है

रोहित सोनी ‘ताबिश’

वो पूछते हैं शौक़ तुझे है विसाल का

रियाज़ ख़ैराबादी

न तारे अफ़्शाँ न कहकशाँ है नमूना हँसती हुई जबीं का

रियाज़ ख़ैराबादी

मतलब की बात शक्ल से पहचान जाइए

रियाज़ ख़ैराबादी

किसी से वस्ल में सुनते ही जान सूख गई

रियाज़ ख़ैराबादी

ग़रीब हम हैं ग़रीबों की भी ख़ुशी हो जाए

रियाज़ ख़ैराबादी

शब-ओ-रोज़ रक़्स-ए-विसाल था सो नहीं रहा

रेहाना रूही

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