आग Poetry (page 32)

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

दाग़ देहलवी

फ़लक देता है जिन को ऐश उन को ग़म भी होते हैं

दाग़ देहलवी

देख कर जौबन तिरा किस किस को हैरानी हुई

दाग़ देहलवी

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

दाग़ देहलवी

दिन तो शिकम की आग बुझाने में जाए है

दाएम ग़व्वासी

चेहरे पे नूर-ए-सुब्ह सियह गेसुओं में रात

दाएम ग़व्वासी

जंग

चन्द्रभान ख़याल

हमें बर्बादियों पे मुस्कुराना ख़ूब आता है

चाँदनी पांडे

रामायण का एक सीन

चकबस्त ब्रिज नारायण

मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले

चकबस्त ब्रिज नारायण

मेरे ख़ामोश ख़ुदा

बुशरा एजाज़

सोज़-ए-फ़िराक़ दिल में छुपाए हुए हैं हम

बबल्स होरा सबा

जब ख़िज़ाँ आई चमन में सब दग़ा देने लगे

बूम मेरठी

ये कैसी आग अभी ऐ शम्अ तेरे दिल में बाक़ी है

बिस्मिल इलाहाबादी

क्या रौशनी-ए-हुस्न-ए-सबीह अंजुमन में है

बिशन नरायण दराबर

शाम से हम ता सहर चलते रहे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

पाबंदियों से अपनी निकलते वो पा न थे

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

जीना है ख़ूब औरों की ख़ातिर जिया करो

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

कभी तो सामने आ बे-लिबास हो कर भी

भवेश दिलशाद

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दश्त में उड़ते बगूलों की ये मस्ती एक दिन

भारत भूषण पन्त

अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे

बेताब अज़ीमाबादी

तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे

बेकल उत्साही

मैं जब भी कोई अछूता कलाम लिखता हूँ

बेकल उत्साही

ग़म-ए-आफ़ाक़ में आरिफ़ अगर करवट बदलता है

बेबाक भोजपुरी

वो दरिया-बार अश्कों की झड़ी है

बयान मेरठी

मिस्ल-ए-हुबाब-ए-बहर न इतना उछल के चल

बयान मेरठी

आएँगे गर उन्हें ग़ैरत होगी

बयान मेरठी

ये आरज़ू है कि वो नामा-बर से ले काग़ज़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

अजब सी आग थी जलता रहा बदन सारा

बशीर फ़ारूक़ी

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