आंख Poetry (page 21)

किसी दश्त का लब-ए-ख़ुश्क हूँ जो न पाए मुज़्दा-ए-आब तक

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

इस आँख में ख़्वाब-ए-नाज़ हो जा

सलीम अहमद

हर आँख का हासिल दूरी है

सलीम अहमद

दुख दे या रुस्वाई दे

सलीम अहमद

दिलों में दर्द भरता आँख में गौहर बनाता हूँ

सलीम अहमद

दीदनी है हमारी ज़ेबाई

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

अहल-ए-दिल ने इश्क़ में चाहा था जैसा हो गया

सलीम अहमद

तरब-आफ़रीं है कितना सर-ए-शाम ये नज़ारा

सलाम संदेलवी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

चैत

सलाहुद्दीन परवेज़

फिर उलझते हैं वो गेसू की तरह

सख़ी लख़नवी

दिल उसे दे दिया 'सख़ी' ही तो है

सख़ी लख़नवी

तस्वीरें

सज्जाद ज़हीर

तिरे तग़ाफ़ुल से है शिकायत न अपने मिटने का कोई ग़म है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

जुर्म-ए-इज़हार-ए-तमन्ना आँख के सर आ गया

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हमें चार सम्त की दौड़ में वही गर्द-ए-बाद-ए-सदा मिला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हाल-ए-दिल कुछ जो सर-ए-बज़्म कहा है मैं ने

सज्जाद बाक़र रिज़वी

'बाक़र' निशाना-ए-ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम तो हो

सज्जाद बाक़र रिज़वी

लहर उस आँख में लहराई जो बे-ज़ारी की

सज्जाद बलूच

लहर इस आँख में लहराई जो बे-ज़ारी की

सज्जाद बलूच

हवा में कुछ तो घुला था कि होंट नीले हुए

सज्जाद बाबर

हर तरफ़ धूप की चादर को बिछाने वाला

साजिद प्रेमी

ज़मीं की आँख ख़ाली है दिनों ब'अद

साजिद हमीद

मैं चाहता हूँ कि हर शय यहाँ सँवर जाए

साजिद हमीद

शिकस्ता-दिल थे तिरा ए'तिबार क्या करते

साजिद अमजद

सर-ए-ख़याल मैं जब भूल भी गई कि मैं हूँ

साइमा असमा

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