बात Poetry (page 114)

शाम से मिलने गया तो रात ने ठहरा लिया

अबरार हामिद

उस ने कल भागते लम्हों को पकड़ रक्खा था

अबरार आज़मी

तुम्हारी बज़्म में जिस बात का भी चर्चा था

अबरार आज़मी

किस का है जुर्म किस की ख़ता सोचना पड़ा

अबरार आज़मी

ख़याल लम्स का कार-ए-सवाब जैसा था

अबरार आज़मी

हमें ख़बर नहीं कुछ कौन है कहाँ कोई है

अबरार अहमद

फ़िक्र का गर सिलसिला मौजूद है

अबरार आबिद

न जाने रब्त-ए-मसर्रत है किस क़दर ग़म से

आबिद नामी

जब आसमान पर मह-ओ-अख़्तर पलट कर आए

आबिद मुनावरी

ये कार-ए-ख़ैर है इस को न कार-ए-बद समझो

आबिद मलिक

गले लगाए मुझे मेरा राज़दाँ हो जाए

आबिद मलिक

इक अजनबी की तरह है ये ज़िंदगी मिरे साथ

आबिद मलिक

ज़मीं से चल के तो पहुँचा हूँ आसमाँ तक मैं

आबिद हशरी

किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई

आबिद आलमी

ये जो दुनिया है इसे इतनी इजाज़त कब है

अभिषेक शुक्ला

जफ़ा के ज़िक्र पे वो बद-हवास कैसा है

अब्दुस्समद ’तपिश’

जफ़ा के ज़िक्र पे वो बद-हवास कैसा है

अब्दुस्समद ’तपिश’

रोज़ वहशत कोई नई मिरे दोस्त

अब्दुर्राहमान वासिफ़

मज़ीद कुछ नहीं बोला मैं हो गया ख़ामोश

अब्दुर्राहमान वासिफ़

अगर तुम रोक दो इज़हार-ए-लाचारी करूँगा

अब्दुर्राहमान वासिफ़

ख़मोशी मेरी लय में गुनगुनाना चाहती है

अब्दुर रऊफ़ उरूज

कुछ न किया अरबाब-ए-जुनूँ ने फिर भी इतना काम किया

अब्दुर रऊफ़ उरूज

ख़मोशी मेरी लय में गुनगुनाना चाहती है

अब्दुर रऊफ़ उरूज

लग़्ज़िश-ए-साक़ी-ए-मय-ख़ाना ख़ुदा ख़ैर करे

अब्दुल्लतीफ़ शौक़

जो गुज़रता है गुज़र जाए जी

अब्दुल्लाह जावेद

चाँदनी रात में हर दर्द सँवर जाता है

अब्दुल्लाह जावेद

चमका जो चाँद रात का चेहरा निखर गया

अब्दुल्लाह जावेद

तेरा ही मैं गदा हूँ मेरा तू शाह बस है

अब्दुल वहाब यकरू

इस तरह रुख़ फेरते हो सुनते ही बोसे की बात

अब्दुल वहाब यकरू

साकिन है कोई और वतन और किसी का

अब्दुल वहाब सुख़न

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