बात Poetry (page 38)

रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम

सख़ी लख़नवी

हम उन से आज का शिकवा करेंगे

सख़ी लख़नवी

न बचपन में कहो हम को कड़ी बात

सख़ी लख़नवी

गो तिरे शहर में भी रात रहे

शख़ावत शमीम

ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उन से वो रस्म-ए-मुलाक़ात चली जाती है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तेरे शैदा भी हुए इश्क़-ए-तमाशा भी हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

शो'ला सा कोई बर्क़-ए-नज़र से नहीं उठता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हासिल-ए-ज़ीस्त इश्क़ ही तो नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

'बाक़र' निशाना-ए-ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम तो हो

सज्जाद बाक़र रिज़वी

ब-क़द्र-ए-हौसला कोई कहीं कोई कहीं तक है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अपने जीने को क्या पूछो सुब्ह भी गोया रात रही

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अँधेरे दिन की सफ़ारत को आए हैं अब के

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अक्सर बैठे तन्हाई की ज़ुल्फ़ें हम सुलझाते हैं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

खोल कर बात का भरम दोनों

सज्जाद बलूच

खोल कर बात का भरम दोनों

सज्जाद बलूच

ख़ला में घूर रहा है अजीब आदमी है

सज्जाद बलूच

लफ़्ज़ का कितना तक़द्दुस है ये कब जानते हैं

सज्जाद बाबर

जलती हवाएँ कह गईं अज़्म-ए-सबात छोड़ दे

सज्जाद बाबर

इक दर्द सब के दर्द का मज़हर लगा मुझे

सज्जाद बाबर

बनते रहे हैं दिल में अजब गर्द-बाद से

सज्जाद बाबर

जो महव-ए-हालात नहीं है

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

हर शय की अक़ीदत से तस्वीर नहीं बनती

साजिद सिद्दीक़ी लखनवी

रहता है आस-पास सवेरे से शाम तक

साजिद सजनी

दिल के आँगन में जो दीवार उठा ली जाए

साजिद प्रेमी

शिकस्ता-दिल थे तिरा ए'तिबार क्या करते

साजिद अमजद

पंक्चुवेशन

साइमा असमा

उस रस्ते पर जाते देखा कोई नहीं है

साइमा असमा

सर-ए-ख़याल मैं जब भूल भी गई कि मैं हूँ

साइमा असमा

कोई इम्काँ तो न था उस का मगर चाहता था

साइमा असमा

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