बात Poetry (page 37)

तिरी तलाश में गुज़रे कई ज़माने मुझे

सलीम काशीर

मैं रात हव्वा

सलीम फ़िगार

बस लौट आना

सलीम फ़िगार

सहमे नहीफ़ दरिया के धारे की बात कर

सलीम फ़िगार

चमकती ओस की सूरत गुलों की आरज़ू होना

सलीम फ़िगार

हर-चंद तिरे ग़म का सहारा भी नहीं है

सलीम फ़राज़

फ़स्ल-ए-जुनूँ में दामन-ओ-दिल चाक भी नहीं

सलीम फ़राज़

क़िस्सा छेड़ा मेहर ओ वफ़ा का अव्वल-ए-शब उन आँखों ने

सलीम अहमद

ये ख़्वाब और भी देखेंगे रात बाक़ी है

सलीम अहमद

वो मिरे दिल की रौशनी वो मिरे दाग़ ले गई

सलीम अहमद

वस्ल ओ फ़स्ल की हर मंज़िल में शामिल इक मजबूरी थी

सलीम अहमद

तर्क उन से रस्म-ओ-राह-ए-मुलाक़ात हो गई

सलीम अहमद

समाअतों को अमीन-ए-नवा-ए-राज़ किया

सलीम अहमद

'सलीम' दश्त-ए-तमन्ना में कौन है किस का

सलीम अहमद

मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

दुख दे या रुस्वाई दे

सलीम अहमद

गुल-ओ-ग़ुंचा अस्ल में हैं तिरी गुफ़्तुगू की शक्लें

सलाम संदेलवी

तरब-आफ़रीं है कितना सर-ए-शाम ये नज़ारा

सलाम संदेलवी

यूँ ही आँखों में आ गए आँसू

सलाम मछली शहरी

अजीब बात है मैं जब भी कुछ उदास हुआ

सलाम मछली शहरी

धुआँ

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

ये अब्र-ओ-बाद ये तूफ़ान ये अँधेरी रात

सलाम मछली शहरी

फूलों के देस चाँद सितारों के शहर में

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

था ख़्वाब में ख़याल को तुझ से मुआमला

सलाहुद्दीन परवेज़

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