बात Poetry (page 35)

इश्क़ में कुछ इस सबब से भी है आसानी मुझे

सरफ़राज़ शाहिद

मैं फ़र्त-ए-मसर्रत से डर है कि न मर जाऊँ

सरदार सोज़

बुझे चराग़ जलाने में देर लगती है

सरदार सोज़

अफ़्सोस क्या जो हम भी तुम्हारे नहीं रहे

सरदार सोज़

मौजा-ए-रेग-ए-रवान-ए-ग़म में बह के देखना

सरदार सलीम

कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ

सरदार सलीम

तेरी महफ़िल में जितने ऐ सितम-गर जाने वाले हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

नाला शब-ए-फ़िराक़ जो कोई निकल गया

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ये बात सच है कि वो ज़िंदगी नहीं मेरी

सदार आसिफ़

ये झूट है कि बिछड़ने का उस को ग़म भी नहीं

सदार आसिफ़

मैं जिन को ढूँडने निकला था गहरे ग़ारों में

सदार आसिफ़

लफ़्ज़ों का ये ख़ज़ाना तिरे नाम कब हुआ

सदार आसिफ़

खाते हैं हम हचकोले इस पागल संसार के बीच

सरस्वती सरन कैफ़

चलेगी न ऐ दिल कोई घात हरगिज़

सरस्वती सरन कैफ़

शायद मिट्टी मुझे फिर पुकारे

सारा शगुफ़्ता

आधा कमरा

सारा शगुफ़्ता

ग़श भी आया मिरी पुर्सिश को क़ज़ा भी आई

साक़िब लखनवी

ये कैसी बात हुई है कि देख कर ख़ुश है

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे समझने की कोशिश न की मोहब्बत ने

साक़ी फ़ारुक़ी

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते

साक़ी फ़ारुक़ी

मुर्दा-ख़ाना

साक़ी फ़ारुक़ी

मरता लम्हा

साक़ी फ़ारुक़ी

घर

साक़ी फ़ारुक़ी

ये ज़ुल्म है ख़याल से ओझल न कर उसे

साक़ी फ़ारुक़ी

यहीं कहीं पे कभी शोला-कार मैं भी था

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

जो तेरे दिल में है वो बात मेरे ध्यान में है

साक़ी फ़ारुक़ी

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते

साक़ी फ़ारुक़ी

बदन चुराते हुए रूह में समाया कर

साक़ी फ़ारुक़ी

आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो

साक़ी फ़ारुक़ी

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