बात Poetry (page 36)

ज़िंदगी भर मुझे इस बात की हसरत ही रही

साक़ी अमरोहवी

सामने जब कोई भरपूर जवानी आए

साक़ी अमरोहवी

अमीर-ए-शहर के आँगन में जब उजाले हुए

संजय मिश्रा शौक़

कैसे इस बात पर यक़ीं कर लूँ

संदीप कोल नादिम

चश्म-ए-तर है कोई सराब नहीं

संदीप कोल नादिम

शरह-ए-जमाल कीजे शहादत के मा-सिवा

समद अंसारी

जब शाम शहर में आती है

सलमान सईद

ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है

सलमान अख़्तर

ख़ाली बरामदों ने मुझे देख कर कहा

सलमान अख़्तर

झूटी उम्मीद की उँगली को पकड़ना छोड़ो

सलमान अख़्तर

ये अलग बात कि वो मुझ से ख़फ़ा रहता है

सलमान अख़्तर

ख़्वाबों के आसरे पे बहुत दिन जिए हो तुम

सलमान अख़्तर

झूटी उम्मीद की उँगली को पकड़ना छोड़ो

सलमान अख़्तर

हम जो पहले कहीं मिले होते

सलमान अख़्तर

उसे भुला न सकी नक़्श इतने गहरे थे

सलमा शाहीन

हम झुकाते भी कहाँ सर को क़ज़ा से पहले

सलमा शाहीन

चश्म-ए-नम पहले शफ़क़ बन के सँवरना चाहे

सलमा शाहीन

तमाम उम्र की तन्हाइयों पे भारी थी

सलीम शुजाअ अंसारी

क्या हो गया कि बैठ गई ख़ाक भी मिरी

सालिम सलीम

दालान में कभी कभी छत पर खड़ा हूँ मैं

सालिम सलीम

जाने कैसे होंगे आँसू बहते हैं तो बहने दो

सलीम रज़ा रीवा

डरता रहता हूँ हम-नशीनों में

सालिक लखनवी

रंग ताबीर का टूटे हुए ख़्वाबों में नहीं

सलीम शहज़ाद

नहीं है कोई दूसरा मंज़र चारों ओर

सलीम शहज़ाद

क़ाइल करूँ किस बात से मैं तुझ को सितमगर

सलीम शाहिद

मुर्दा रगों में ख़ून की गर्मी कहाँ से आई

सलीम शाहिद

खुलती है गुफ़्तुगू से गिरह पेच-ओ-ताब की

सलीम शाहिद

फिर जी उठे हैं जिस से वो इम्कान तुम नहीं

सलीम कौसर

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

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