बात Poetry (page 42)

शिकस्त-ए-आबला-ए-दिल में नग़्मगी है बहुत

सादिक़ नसीम

गुज़रे हैं तेरे साथ जो दिन-रात अभी तक

सादिक़ा फ़ातिमी

'सदा' के पास है दुनिया का तजरबा वाइज़

सदा अम्बालवी

यूँ तो इक उम्र साथ साथ हुई

सदा अम्बालवी

रस्म-ए-दुनिया तो किसी तौर निभाते जाओ

सदा अम्बालवी

न ज़िक्र गुल का कहीं है न माहताब का है

सदा अम्बालवी

वो क्यूँ न रूठता मैं ने भी तो ख़ता की थी

साबिर ज़फ़र

वो धूप वो गलियाँ वही उलझन नज़र आए

साबिर वसीम

और मोड़ ने कहा

साबिर दत्त

मुझ से कल महफ़िल में उस ने मुस्कुरा कर बात की

साबिर

सच यही है कि बहुत आज घिन आती है मुझे

साबिर

मुझे क़रार भँवर में उसे किनारे में

साबिर

ख़ूबियों को मस्ख़ कर के ऐब जैसा कर दिया

साबिर

ये दिल की दास्तान है कि दिल ग़ुलाम कर दिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

तू नहीं है तो मिरी शाम अकेली चुप है

सबीहा सबा, पाकिस्तान

जब कभी हादसात ने मारा

सबीहा सबा, पाकिस्तान

जान गए तो मान लिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

ग़मों से अपने कोई शख़्स चूर होता है

सबीहा सबा, पाकिस्तान

ये सैल-ए-अश्क मुझे गुफ़्तुगू की ताब तो दे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली

सबा जायसी

बू-ए-ख़ुश की तरह हर सम्त बिखर जाऊँगा

सबा जायसी

और किस तरह उसे कोई क़बा दी जाए

सबा जायसी

जो हमारे सफ़र का क़िस्सा है

सबा अकबराबादी

कारवाँ लुट गया राहबर छुट गया रात तारीक है ग़म का यारा नहीं

सबा अफ़ग़ानी

मोहब्बत में जीना नई बात है

साइल देहलवी

होते ही जवाँ हो गए पाबंद-ए-हिजाब और

साइल देहलवी

ये रात दिन का बदलना नज़र में रहता है

सादुल्लाह शाह

ये जमाल क्या ये जलाल क्या ये उरूज क्या ये ज़वाल क्या

सादुल्लाह शाह

वक़्त तो वक़्त है रुकता नहीं इक पल के लिए

सादुल्लाह शाह

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