चाँद Poetry (page 30)

आँखों की नदी सूख गई फिर भी हरा है

असग़र गोरखपुरी

वो जो नहीं हैं बज़्म में बज़्म की शान भी नहीं

असर रामपुरी

ये जो शाम ज़र-निगार है

असअ'द बदायुनी

तलब की राहों में सारे आलम नए नए से

असअ'द बदायुनी

पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह

आरज़ू लखनवी

गोरे गोरे चाँद से मुँह पर काली काली आँखें हैं

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

चोट दिल पर लगे और आह ज़बाँ से निकले

अरुण कुमार आर्य

आग़ाज़-ए-आशिक़ी का अल्लाह रे ज़माना

अर्शी भोपाली

तुम्हारे जम्परों पर साड़ियों पर और ग़रारों पर

अरशद मीर

मैं ने उसी से हाथ मिलाया था और बस

अरशद महमूद अरशद

किसी सूरत अगर इज़हार की सूरत निकल आए

अरशद लतीफ़

कभी जो उस की तमन्ना ज़रा बिफर जाए

अरशद कमाल

पलट कर देखने का मुझ में यारा ही नहीं था

अरशद जमाल 'सारिम'

क्या कहूँ कितनी अज़िय्यत से निकाली गई शब

अरशद जमाल 'सारिम'

हुज़ूर-ए-ग़ैर तुम उश्शाक़ की तहक़ीर करते हो

अरशद अली ख़ान क़लक़

सुख़न के चाक में पिन्हाँ तुम्हारी चाहत है

अरशद अब्दुल हमीद

है टोंक अर्ज़-ए-पाक वहीं से उठेंगे हम

अरशद अब्दुल हमीद

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

गुज़रते दिन के दुखों का पता तो देता था

अरमान नज्मी

गिरते उभरते डूबते धारे से कट गया

अरमान नज्मी

दोज़ख़ भी क्या गुमान है जन्नत भी है फ़रेब

आरिफ़ शफ़ीक़

अंधे अदम वजूद के गिर्दाब से निकल

आरिफ़ शफ़ीक़

वो कारवान-ए-बहाराँ कि बे-दरा होगा

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तिरे बाज़ूओं का सहारा तो ले लूँ मगर उन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

तिरे बाज़ुओं का सहारा तो ले लूँ मगर इन में भी रच गई है थकन

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मैं जिस को राह दिखाऊँ वही हटाए मुझे

आरिफ़ अब्दुल मतीन

कितनी हसरत से तिरी आँख का बादल बरसा

आरिफ़ अब्दुल मतीन

किसी परिंदे ने उड़ने का मन बनाया है

आराधना प्रसाद

क्या शहर में है गर्मी-ए-बाज़ार के सिवा

अनवर सिद्दीक़ी

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