दम Poetry (page 9)
धूप के भीतर छुप कर निकली
स्वप्निल तिवारी
रंज इस का नहीं कि हम टूटे
सूर्यभानु गुप्त
बुलबुल ओ परवाना
सुरूर जहानाबादी
किसी मस्त-ए-ख़्वाब का है अबस इंतिज़ार सो जा
सुरूर जहानाबादी
दस्त-ओ-पा हैं सब के शल इक दस्त-ए-क़ातिल के सिवा
सुरूर बाराबंकवी
और कोई दम की मेहमाँ है गुज़र जाएगी रात
सुरूर बाराबंकवी
सिलसिला मेरे सफ़र का कभी टूटा ही नहीं
सुल्तान अख़्तर
रक़्स-ए-ताऊस-ए-तमन्ना नहीं होने वाला
सुल्तान अख़्तर
रक़्स करता है ब-अंदाज़-ए-जुनूँ दौड़ता है
सुल्तान अख़्तर
हंगामों के क़हत से खिड़की दरवाज़े मबहूत
सुल्तान अख़्तर
तुझ से बिछड़ूँ तो ये ख़दशा है अकेला हो जाऊँ
सुलेमान ख़ुमार
रोज़ ओ शब इस सोच में डूबा रहता हूँ
सुलेमान ख़ुमार
जब तू मुझ से रूठ गया था
सुलेमान ख़ुमार
तुम्हें क्या?
सुलैमान अरीब
इरफ़ान
सुलैमान अरीब
आख़िरी लफ़्ज़ पहली आवाज़
सुलैमान अरीब
वो मिज़ाज दिल के बदल गए कि वो कारोबार नहीं रहा
सुलैमान अहमद मानी
ख़िज़ाँ की आज़माइश हो गया हूँ
सुहैल अख़्तर
सुकून-ए-क़ल्ब ओ शकेब-ए-नज़र की बात करो
सूफ़ी तबस्सुम
कुछ और गुमरही-ए-दिल का राज़ क्या होगा
सूफ़ी तबस्सुम
किसी में ताब-ए-अलम नहीं है किसी में सोज़-ए-वफ़ा नहीं है
सूफ़ी तबस्सुम
काविश-ए-बेश-ओ-कम की बात न कर
सूफ़ी तबस्सुम
दिल को आए कि निगाहों को यक़ीं आ जाए
सूफ़ी तबस्सुम
दुश्मनी में ही सही वो ये करम करता रहा
सुभाष पाठक ज़िया
फ़सील-ए-दर्द को मैं मिस्मार करने वाली हूँ
सिया सचदेव
वो ज़ुल्फ़ है तो हर्फ़-ए-ततार-ओ-ख़ुतन ग़लत
सिराज औरंगाबादी
तुझ पर फ़िदा हैं सारे हुस्न-ओ-जमाल वाले
सिराज औरंगाबादी
सीमाब जल गया तो उसे गर्द बोलिए
सिराज औरंगाबादी
सनम जब चीरा-ए-ज़र-तार बाँधे
सिराज औरंगाबादी
सनम हज़ार हुआ तो वही सनम का सनम
सिराज औरंगाबादी
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