दूर Poetry (page 16)

इक ज़माने से फ़लक ठहरा हुआ लगता है

शोहरत बुख़ारी

मियाँ बाज़ार को शर्मिंदा करना क्या ज़रूरी है

शोएब निज़ाम

किसी नादीदा शय की चाह में अक्सर बदलते हैं

शोएब निज़ाम

चश्म-ए-गर्दूं फिर तमाज़त अपनी बरसाने लगी

शोएब निज़ाम

तमाम ख़ुशियाँ तमाम सपने हम एक दूजे के नाम कर के

शमशाद शाद

इक दामन में फूल भरे हैं इक दामन में आग ही आग

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

वो रू-ब-रू हों तो ये कैफ़-ए-इज़्तिराब न हो

शिव दयाल सहाब

साक़ी-ए-दौराँ कहाँ वो तेरे मय-ख़ाने गए

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

सोज़-ए-अलम से दूर हुआ जा रहा हूँ मैं

शेरी भोपाली

ग़ज़ब है जुस्तजू-ए-दिल का ये अंजाम हो जाए

शेरी भोपाली

वो हद से दूर होते जा रहे हैं

शेर सिंह नाज़ देहलवी

कसरत-ए-वहदानियत में हुस्न की तनवीर देख

शेर सिंह नाज़ देहलवी

दिल दिया है हम ने भी वो माह-ए-कामिल देख कर

शेर सिंह नाज़ देहलवी

आलम में हुस्न तेरा मशहूर जानते हैं

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

वक़्त आफ़ाक़ के जंगल का जवाँ चीता है

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

ज़ख़्मी हूँ तिरे नावक-ए-दुज़-दीदा-नज़र से

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

हंगामा गर्म हस्ती-ए-ना-पाएदार का

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

कौन दुनिया से बादा-ख़्वार उठा

शैख़ अली बख़्श बीमार

दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया

शहपर रसूल

बे-इंतिहा होना है तो इस ख़ाक के हो जाओ

शहपर रसूल

मह्व हूँ मैं जो उस सितमगर का

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

पाँव में दूर का सफ़र चमके

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

छटा आदमी

शाज़ तमकनत

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए

शाज़ तमकनत

नफ़स नफ़स है तिरे ग़म से चूर चूर अब तक

शाज़ तमकनत

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