दूर Poetry (page 14)

तन्हाइयों की बर्फ़ थी बिस्तर पे जा-ब-जा

सुल्तान अख़्तर

रोज़ ओ शब इस सोच में डूबा रहता हूँ

सुलेमान ख़ुमार

बीमार सा है जिस्म-ए-सहर काँप रहा है

सुलेमान ख़ुमार

तिरा दिल तो नहीं दिल की लगी हूँ

सुलैमान अरीब

कोई दुश्मन कोई हमदम भी नहीं साथ अपने

सुलैमान अरीब

हिसाब-ए-उम्र करो या हिसाब-ए-जाम करो

सुलैमान अरीब

हर बात तिरी जान-ए-जहाँ मान रहा हूँ

सुलैमान अरीब

आज भी हाथ पे है तेरे पसीने की तरी

सुलैमान अरीब

वफ़ा का इम्तिहाँ है जान-आे-तन की आज़माइश है

सुलैमान आसिफ़

वो तो हर चाहने वाले पे फ़िदा लगता है

सुहैल सानी

जो कुछ हुआ सो हुआ अब सवाल ही क्या है

सुहा मुजद्ददी

दो आलम के आफ़ात से दूर कर दे

सुहा मुजद्ददी

ज़र्द-चमेली

सूफ़िया अनजुम ताज

नज़्म

सूफ़ी तबस्सुम

अजनबी ख़त-ओ-ख़ाल

सूफ़ी तबस्सुम

हुस्न को जो मंज़ूर हुआ

सूफ़ी तबस्सुम

ग़म-नसीबों को किसी ने तो पुकारा होगा

सूफ़ी तबस्सुम

इंसाँ हवस के रोग का मारा है इन दिनों

सोज़ नजीबाबादी

बहते पानी की तरह मौज-ए-सदा की सूरत

सोज़ नजीबाबादी

रह कर भी तुझ से दूर तिरे आस-पास हूँ

सिया सचदेव

है धूप तेज़ कोई साएबान कैसे हो

सिया सचदेव

नुमूद उन की भी दौर-ए-सुबू में थी कल रात

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर-ए-साग़र-ओ-यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

बग़ैर साग़र ओ यार-ए-जवाँ नहीं गुज़रे

सिराजुद्दीन ज़फ़र

क़फ़स से दूर सही मौसम-ए-बहार तो है

सिराज लखनवी

ख़ुशा वो दौर कि जब मरकज़-ए-निगाह थे हम

सिराज लखनवी

ये इंक़लाब भी ऐ दौर-ए-आसमाँ हो जाए

सिराज लखनवी

ईमाँ की नुमाइश है सज्दे हैं कि अफ़्साने

सिराज लखनवी

दुनिया का न उक़्बा का कोई ग़म नहीं सहते

सिराज लखनवी

अब इतनी अर्ज़ां नहीं बहारें वो आलम-ए-रंग-ओ-बू कहाँ है

सिराज लखनवी

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