दर्द Poetry (page 63)

कौन भला ये कहता है ख़ुद आ के हम को मनाएँ आप

बाक़र मेहदी

दीवानगी की राह में गुम-सुम हुआ न था!

बाक़र मेहदी

चाहा बहुत कि इश्क़ की फिर इब्तिदा न हो

बाक़र मेहदी

अब नहीं दर्द छुपाने का क़रीना मुझ में

बक़ा बलूच

किरदार ही से ज़ीनत-ए-अफ़्लाक हो गए

बनो ताहिरा सईद

कहाँ से मंज़र समेट लाए नज़र कहाँ से उधार माँगे

लराज बख़्शी

मिरे हर लफ़्ज़ की तौक़ीर रहने के लिए है

बख़्श लाइलपूरी

हम-कलामी में दर-ओ-दीवार से

बहराम तारिक़

रखा सर पर जो आया यार का ख़त

बहराम जी

किया है संदलीं-रंगों ने दर बंद

बहराम जी

हो चुका वाज़ का असर वाइज़

बहराम जी

दूर हो दर्द-ए-दिल ये और दर्द-ए-जिगर किसी तरह

बहराम जी

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

टुकड़े नहीं हैं आँसुओं में दिल के चार पाँच

ज़फ़र

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ

ज़फ़र

न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना

ज़फ़र

मोहब्बत चाहिए बाहम हमें भी हो तुम्हें भी हो

ज़फ़र

इश्क़ तो मुश्किल है ऐ दिल कौन कहता सहल है

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

महसूस हो रहा है जो ग़म मेरी ज़ात का

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

जाने फिर तुम से मुलाक़ात कभी हो कि न हो

बीएस जैन जौहर

इक हूक सी जब दिल में उट्ठी जज़्बात हमारे आ पहुँचे

बीएस जैन जौहर

अब आँख भी मश्शाक़ हुई ज़ेर-ओ-ज़बर की

अज़रा परवीन

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

आँसुओं से लिख रहे हैं बेबसी की दास्ताँ

अज़्म शाकरी

तीरगी में सुब्ह की तनवीर बन जाएँगे हम

अज़्म शाकरी

अपने दुख-दर्द का अफ़्साना बना लाया हूँ

अज़्म शाकरी

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