नदी Poetry (page 45)

चाँद मेरे घर में उतरा था कहीं डूबा न था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

ऐसे देखा है कि देखा ही न हो

अनवर शऊर

मौसम सर्द हवाओं का

अनवर सदीद

हर सम्त समुंदर है हर सम्त रवाँ पानी

अनवर सदीद

इश्क़ मुकम्मल ख़्वाब-ए-परेशाँ

अनवर साबरी

मेरी क़िस्मत कि वो अब हैं मिरे ग़म-ख़्वारों में

अनवर मसूद

मैं देख भी न सका मेरे गिर्द क्या गया था

अनवर मसूद

कब तलक यूँ धूप छाँव का तमाशा देखना

अनवर मसूद

उतरी शाम तो बरसा पानी या अल्लाह

अनवर ख़ान

तू भी ऐसा सोचती होगी

अनवार फ़ितरत

उन से हम लौ लगाए बैठे हैं

अनवर देहलवी

आओ देखें अहल-ए-वफ़ा की होती है तौक़ीर कहाँ

अनवर मोअज़्ज़म

जुर्म ठहरा हाल से आगे का नक़्शा देखना

अनसर अली अनसर

हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे

अंजुम तराज़ी

चल तो सकता था मैं भी पानी पर

अंजुम सलीमी

ये मोहब्बत का जो अम्बार पड़ा है मुझ में

अंजुम सलीमी

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अंजुम रहबर

बे-हिफ़ाज़त ही मिरा गंज-ए-मआ'नी रह गया

अंजुम नियाज़ी

तोड़ कड़ियाँ ज़मीर कि 'अंजुम'

अंजुम लुधियानवी

खोया खोया रहता है

अंजुम लुधियानवी

जाने किस की आहट का इंतिज़ार करता है

अंजुम लुधियानवी

इक झलक तेरी जो पाई होगी

अंजुम लुधियानवी

पलकों तक आ के अश्क का सैलाब रह गया

अंजुम ख़लीक़

बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का

अंजुम इरफ़ानी

हम सब को बताते रहते हैं ये बात पुरानी काम की है

अंजुम बाराबंकवी

मुद्दत से कोई उन की तहरीर नहीं मिलती

अंजना संधीर

माल-ए-दुनिया तलाश करना है

अनीस अब्र

हमेशा किसी इम्तिहाँ में रहा

अनीस अशफ़ाक़

पथरीली सी शाम में तुम ने ऐसे याद किया जानम

अनीस अंसारी

मुझे इल्ज़ाम न दे तर्क-ए-शकेबाई का

अंदलीब शादानी

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