नदी Poetry (page 49)

असीर-ए-दश्त-ए-बला का न माजरा कहना

आलमताब तिश्ना

लकीर खींच के बैठी है तिश्नगी मिरी

आलम ख़ुर्शीद

मैं जिस जगह भी रहूँगा वहीं पे आएगा

आलम ख़ुर्शीद

मयस्सर से ज़ियादा चाहता है

अकरम नक़्क़ाश

लहू तेज़ाब करना चाहता है

अकरम नक़्क़ाश

हैरत से देखता हुआ चेहरा किया मुझे

अकरम नक़्क़ाश

दश्त को ढूँडने निकलूँ तो जज़ीरा निकले

अकरम नक़्क़ाश

ख़ाक से ख़्वाब तलक एक सी वीरानी है

अकरम महमूद

चढ़े हुए हैं जो दरिया उतर भी जाएँगे

अकरम महमूद

ज़िंदगी तेरे अजब ठोर-ठिकाने निकले

अकमल इमाम

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

ए'तिमाद

अख़्तर-उल-ईमान

एक लड़का

अख़्तर-उल-ईमान

आँख दरिया जिगर लहू करना

अख़्तर ज़ियाई

या तो सूरज झूट है या फिर ये साया झूट है

अख्तर शुमार

सारी ख़िल्क़त एक तरफ़ थी और दिवाना एक तरफ़

अख्तर शुमार

ओ देस से आने वाले बता

अख़्तर शीरानी

नज़्र-ए-वतन

अख़्तर शीरानी

लम्हा लम्हा यही सोचूँ यही देखा चाहूँ

अख़तर शाहजहाँपुरी

आज भी दश्त-ए-बला में नहर पर पहरा रहा

अख़्तर सईद ख़ान

घोर अँधेरा

अख़्तर राही

लिखा है मुझ को भी लिखना पड़ा है

अख़्तर नज़्मी

जीते-जी दुख सुख के लम्हे आते जाते रहते हैं

अख़तर इमाम रिज़वी

दुनिया भी पेश आई बहुत बे-रुख़ी के साथ

अख़तर इमाम रिज़वी

दिल वो प्यासा है कि दरिया का तमाशा देखे

अख़तर इमाम रिज़वी

विसाल

अख़्तर हुसैन जाफ़री

तेरा पार उतरना कैसा

अख़्तर हुसैन जाफ़री

सुख़न दरमाँदा है

अख़्तर हुसैन जाफ़री

रेत सहरा नहीं

अख़्तर हुसैन जाफ़री

इक इनआ'म के कितने नाम हैं

अख़्तर हुसैन जाफ़री

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