दिल Poetry (page 248)

मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें

फ़र्रुख़ जाफ़री

किसी बहाने भी दिल से अलम नहीं जाता

फ़र्रुख़ जाफ़री

सिलसिले ख़्वाब के अश्कों से सँवरते कब हैं

फ़ारूक़ शमीम

हर एक लफ़्ज़ में पोशीदा इक अलाव न रख

फ़ारूक़ शमीम

ग़ज़लों में अब वो रंग न रानाई रह गई

फ़ारूक़ शमीम

कोई भी शख़्स न हंगामा-ए-मकाँ में मिला

फ़ारूक़ शफ़क़

घर की चीज़ों से यूँ आश्ना कौन है

फ़ारूक़ शफ़क़

संग-परस्तों की बस्ती में शीशा-गरों की ख़ैर नहीं है

फ़ारूक़ नाज़की

नींद क्यूँ नहीं आती

फ़ारूक़ नाज़की

बचपन

फ़ारूक़ नाज़की

वही में हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

वही मैं हूँ वही ख़ाली मकाँ है

फ़ारूक़ नाज़की

इतनी ख़राब सूरत-ए-हालात भी नहीं

फ़ारूक़ नाज़की

बस्ती से दूर जा के कोई रो रहा है क्यूँ

फ़ारूक़ नाज़की

अजीब रंग सा चेहरों पे बे-कसी का है

फ़ारूक़ नाज़की

ऐ मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ मैं

फ़ारूक़ नाज़की

ए मरकज़-ए-ख़याल बिखरने लगा हूँ में

फ़ारूक़ नाज़की

न पानियों का इज़्तिरार शहर में

फ़ारूक़ मुज़्तर

दिल-ए-ईज़ा-तलब ले तेरा कहना कर लिया मैं ने

फ़ारूक़ बाँसपारी

ब-रोज़-ए-हश्र मिरे साथ दिल-लगी ही तो है

फ़ारूक़ बाँसपारी

शिकायत

फ़ारूक़ बख़्शी

शहर-ए-दोस्त

फ़ारूक़ बख़्शी

कभी आओ

फ़ारूक़ बख़्शी

उस के होंटों पे बद-दुआ' भी नहीं

फ़ारूक़ बख़्शी

तमाम शहर में उस जैसा ख़स्ता-हाल न था

फ़ारूक़ बख़्शी

मशवरा किस ने दिया था कि मसीहाई कर

फ़ारूक़ बख़्शी

महकते लफ़्ज़ों में शामिल है रंग-ओ-बू किस की

फ़ारूक़ बख़्शी

कैसे इन सच्चे जज़्बों की अब उस तक तफ़्हीम करूँ

फ़ारूक़ बख़्शी

जली हैं दर्द की शमएँ मगर अंधेरा है

फ़ारूक़ बख़्शी

इस ज़मीं आसमाँ के थे ही नहीं

फ़ारूक़ बख़्शी

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