दिल Poetry (page 258)

अब तसव्वुर में हरम है न सनम-ख़ाना है

फ़ना बुलंदशहरी

आँखों में नमी आई चेहरे पे मलाल आया

फ़ना बुलंदशहरी

बहादुरी जो नहीं है तो बुज़दिली भी नहीं

फख्र ज़मान

ग़ज़लें लिख लिख पागल होने वाला हूँ

फख़्र अब्बास

बोला हैं रंग कितने ज़माने के और भी

फ़ाख़िरा बतूल

फिर ज़बान-ए-इश्क़ चश्म-ए-ख़ूँ-फिशाँ होने लगी

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

कुछ ज़िंदगी में लुत्फ़ का सामाँ नहीं रहा

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

कोई तसव्वुर में जल्वा-गर है बहार दिल में समा रही है

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

ग़म-ए-जानाँ के सिवा कुछ हमें प्यारा न हुआ

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

बला से बर्क़ ने फूँका जो आशियाने को

फ़ैज़ी निज़ाम पुरी

रात गहरी है मगर एक सहारा है मुझे

फ़ैज़ी

जो दिल को पहले मयस्सर था क्या हुआ उस का

फ़ैज़ी

जानता हूँ कि कई लोग हैं बेहतर मुझ से

फ़ैज़ी

इस लिए दिल बुरा किया ही नहीं

फ़ैज़ी

वो क्या ख़ुशी थी जो दिल में बहाल रहती थी

फ़ैज़ान हाशमी

मिला रहा हूँ तिरा हुस्न काएनात के साथ

फ़ैज़ान हाशमी

इसी जहाज़ के सहरा में डूब जाने की

फ़ैज़ान हाशमी

दोनों जहाँ से आ गया कर के इधर उधर की सैर

फ़ैज़ान हाशमी

बहुत सा काम तो पहले ही कर लिया मैं ने

फ़ैज़ान हाशमी

आँखें बुझ जाएँगी शोला रह जाएगा

फ़ैज़ान हाशमी

जाने क्या सोच के उस ने सितम ईजाद किया

फ़ैज़ुल हसन

हम ने सहरा को सजाया था गुलिस्ताँ की तरह

फ़ैज़ुल हसन

दिल जिस का दर्द-ए-इश्क़ का हामिल नहीं रहा

फ़ैज़ुल हसन

ऐ दिल अच्छा नहीं मसरूफ़-ए-फ़ुग़ाँ हो जाना

फ़ैज़ुल हसन

सुराही मुज़्महिल है मय का पियाला थक चुका है

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

बात बन जाए जो तफ़्सील से बातें कर ले

फ़ैज़ ख़लीलाबादी

कोई फ़रियाद तिरे दिल में दबी हो जैसे

फ़ैज़ अनवर

उठ कर तो आ गए हैं तिरी बज़्म से मगर

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तेज़ है आज दर्द-ए-दिल साक़ी

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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