दिल Poetry (page 375)

अब शुग़्ल है यही दिल-ए-ईज़ा-पसंद का

अहमद मुश्ताक़

ये कहना तो नहीं काफ़ी कि बस प्यारे लगे हम को

अहमद मुश्ताक़

ये हम ग़ज़ल में जो हर्फ़-ओ-बयाँ बनाते हैं

अहमद मुश्ताक़

उजला तिरा बर्तन है और साफ़ तिरा पानी

अहमद मुश्ताक़

उदास कर के दरीचे नए मकानों के

अहमद मुश्ताक़

टूट गया हवा का ज़ोर सैल-ए-बला उतर गया

अहमद मुश्ताक़

तुम आए हो तुम्हें भी आज़मा कर देख लेता हूँ

अहमद मुश्ताक़

तिरे दीवाने हर रंग रहे तिरे ध्यान की जोत जगाए हुए

अहमद मुश्ताक़

रौशनी रहती थी दिल में ज़ख़्म जब तक ताज़ा था

अहमद मुश्ताक़

पता अब तक नहीं बदला हमारा

अहमद मुश्ताक़

मुसलसल याद आती है चमक चश्म-ए-ग़ज़ालाँ की

अहमद मुश्ताक़

मोनिस-ए-दिल कोई नग़्मा कोई तहरीर नहीं

अहमद मुश्ताक़

मिल ही जाएगा कभी दिल को यक़ीं रहता है

अहमद मुश्ताक़

मिल ही आते हैं उसे ऐसा भी क्या हो जाएगा

अहमद मुश्ताक़

मलाल-ए-दिल से इलाज-ए-ग़म-ए-ज़माना किया

अहमद मुश्ताक़

लुभाता है अगरचे हुस्न-ए-दरिया डर रहा हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

किस शय पे यहाँ वक़्त का साया नहीं होता

अहमद मुश्ताक़

किस रक़्स-ए-जान-आे-तन में मिरा दिल नहीं रहा

अहमद मुश्ताक़

ख़्वाब के फूलों की ताबीरें कहानी हो गईं

अहमद मुश्ताक़

ख़ून-ए-दिल से किश्त-ए-ग़म को सींचता रहता हूँ मैं

अहमद मुश्ताक़

ख़ैर औरों ने भी चाहा तो है तुझ सा होना

अहमद मुश्ताक़

खड़े हैं दिल में जो बर्ग-ओ-समर लगाए हुए

अहमद मुश्ताक़

कहूँ किस से रात का माजरा नए मंज़रों पे निगाह थी

अहमद मुश्ताक़

कहीं उम्मीद सी है दिल के निहाँ ख़ाने में

अहमद मुश्ताक़

कहाँ की गूँज दिल-ए-ना-तवाँ में रहती है

अहमद मुश्ताक़

इन मौसमों में नाचते गाते रहेंगे हम

अहमद मुश्ताक़

हम गिरे हैं जो आ के इतनी दूर

अहमद मुश्ताक़

हाथ से नापता हूँ दर्द की गहराई को

अहमद मुश्ताक़

हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं

अहमद मुश्ताक़

दुनिया में सुराग़-ए-रह-ए-दुनिया नहीं मिलता

अहमद मुश्ताक़

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