दिल Poetry (page 376)

दुख की चीख़ें प्यार की सरगोशियाँ रह जाएँगी

अहमद मुश्ताक़

दिल में वो शोर न आँखों में वो नम रहता है

अहमद मुश्ताक़

धड़कती रहती है दिल में तलब कोई न कोई

अहमद मुश्ताक़

चाँद भी निकला सितारे भी बराबर निकले

अहमद मुश्ताक़

चमक-दमक पे न जाओ खरी नहीं कोई शय

अहमद मुश्ताक़

भागने का कोई रस्ता नहीं रहने देते

अहमद मुश्ताक़

बरस कर खुल गया अब्र-ए-ख़िज़ाँ आहिस्ता आहिस्ता

अहमद मुश्ताक़

अजब नहीं कभी नग़्मा बने फ़ुग़ाँ मेरी

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

अब न बहल सकेगा दिल अब न दिए जलाइए

अहमद मुश्ताक़

अब मंज़िल-ए-सदा से सफ़र कर रहे हैं हम

अहमद मुश्ताक़

आज रो कर तो दिखाए कोई ऐसा रोना

अहमद मुश्ताक़

ये कैसा ख़ूँ है कि बह रहा है न जम रहा है

अहमद महफ़ूज़

ये जो धुआँ धुआँ सा है दश्त-ए-गुमाँ के आस-पास

अहमद महफ़ूज़

वो इक सवाल-ए-सितारा कि आसमान में था

अहमद महफ़ूज़

उठिए कि फिर ये मौक़ा हाथों से जा रहेगा

अहमद महफ़ूज़

उठ जा कि अब ये मौक़ा हाथों से जा रहेगा

अहमद महफ़ूज़

उन आँखों में रंग-ए-मय नहीं है

अहमद महफ़ूज़

फेंकते संग-ए-सदा दरिया-ए-वीरानी में हम

अहमद महफ़ूज़

मैं बंद आँखों से कब तलक ये ग़ुबार देखूँ

अहमद महफ़ूज़

किसी से क्या कहें सुनें अगर ग़ुबार हो गए

अहमद महफ़ूज़

किसी का अक्स-ए-बदन था न वो शरारा था

अहमद महफ़ूज़

वो दे रहा था तलब से सिवा सभी को 'ख़याल'

अहमद ख़याल

मिरे अंदर रवानी ख़त्म होती जा रही है

अहमद ख़याल

जुनूँ को रख़्त किया ख़ाक को लिबादा किया

अहमद ख़याल

फ़लक के रंग ज़मीं पर उतारता हुआ मैं

अहमद ख़याल

तुम्हारे हिज्र को काफ़ी नहीं समझता मैं

अहमद कामरान

ये लग रहा है रग-ए-जाँ पे ला के छोड़ी है

अहमद कमाल परवाज़ी

यही दिल जो इक बूँद है बहर-ए-ग़म की

अहमद जावेद

तुलू-ए-साअत-ए-शब-ख़ूँ है और मेरा दिल

अहमद जावेद

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