दिल Poetry (page 373)

ये कौन बोलता है मिरे दिल के अंदरूँ

अहमद रिज़वान

उड़ती है ख़ाक दिल के दरीचों के आस-पास

अहमद रिज़वान

मैं ख़ाक हो रहा हूँ यहाँ ख़ाक-दान में

अहमद रिज़वान

कुछ इस तरह से लुटी है मता-ए-दीदा-ओ-दिल

अहमद रियाज़

ब-वस्फ़-ए-शौक़ भी दिल का कहा नहीं करते

अहमद रियाज़

ब वस्फ़-ए-शौक़ भी दिल का कहा नहीं करते

अहमद रियाज़

वो दास्ताँ जो तिरी दिल-कशी ने छेड़ी थी

अहमद राही

दिल से दिल नज़रों से नज़रों के उलझने का समाँ

अहमद राही

अब इस के तसव्वुर से भी झुकने लगीं आँखें

अहमद राही

सरगोशी

अहमद राही

लब-ए-गोया

अहमद राही

एक उम्र होती है

अहमद राही

दर्द-ए-मुश्तरक

अहमद राही

ये दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल कहाँ कही जाए

अहमद राही

क़याम-ए-दैर-ओ-तवाफ़-ए-हरम नहीं करते

अहमद राही

क़द ओ गेसू लब-ओ-रुख़्सार के अफ़्साने चले

अहमद राही

मैं दिल-ज़दा हूँ अगर दिल-फ़िगार वो भी हैं

अहमद राही

कोई माज़ी के झरोकों से सदा देता है

अहमद राही

कोई बतलाए कि क्या हैं यारो

अहमद राही

जिस राह से भी गुज़र गए हम

अहमद राही

जिन्हें रास आ गए हैं ये सहर-नुमा अँधेरे

अहमद राही

ग़म-ए-हयात में कोई कमी नहीं आई

अहमद राही

गर्दिश-ए-जाम नहीं गर्दिश-ए-अय्याम तो है

अहमद राही

दिन को रहते झील पर दरिया किनारे रात को

अहमद राही

आम है कूचा-ओ-बाज़ार में सरकार की बात

अहमद राही

तू ने यूँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था

अहमद नदीम क़ासमी

किस दिल से करूँ विदाअ' तुझ को

अहमद नदीम क़ासमी

हर लम्हा अगर गुरेज़-पा है

अहमद नदीम क़ासमी

रूह लबों तक आ कर सोचे

अहमद नदीम क़ासमी

क़यामत

अहमद नदीम क़ासमी

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