दिया Poetry (page 72)

सरमाया-दारी

असरार-उल-हक़ मजाज़

किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

बर्बत-ए-शिकस्ता

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज की रात

असरार-उल-हक़ मजाज़

सारा आलम गोश-बर-आवाज़ है

असरार-उल-हक़ मजाज़

साक़ी-ए-गुलफ़ाम बा-सद एहतिमाम आ ही गया

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई

असरार-उल-हक़ मजाज़

इज़्न-ए-ख़िराम लेते हुए आसमाँ से हम

असरार-उल-हक़ मजाज़

सीना-ए-संग में ढूँढता है गुदाज़

असरारुल हक़ असरार

जानते थे ग़म तिरा दरिया भी था गहरा भी था

असरारुल हक़ असरार

अनजाने लोगों को हर सू चलता फिरता देख रहा हूँ

असरार ज़ैदी

दो-जहाँ के हुस्न का अरमान आधा रह गया

असरार अकबराबादी

रात फिर ख़्वाब में आने का इरादा कर के

असरा रिज़वी

दर्द की जोत मिरे दिल में जगाने वाले

असरा रिज़वी

अदावतों का ये उस को सिला दिया हम ने

असरा रिज़वी

मिरे शौक़-ए-सैर-ओ-सफ़र को अब नए इक जहाँ की नुमूद कर

असलम महमूद

पत्थरों पर वादियों में नक़्श-ए-पा मेरा भी है

असलम महमूद

न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के

असलम महमूद

किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया

असलम महमूद

काँटे से भी निचोड़ ली ग़ैरों ने बू-ए-गुल

असलम कोलसरी

नज़र को वक़्फ़-ए-हैरत कर दिया है

असलम कोलसरी

हर-चंद बे-नवा है कोरे घड़े का पानी

असलम कोलसरी

ज़ीस्त की धूप से यूँ बच के निकलता क्यूँ है

असलम हबीब

मैं ने अपनी ख़्वाहिशों का क़त्ल ख़ुद ही कर दिया

असलम आज़ाद

वो क्या है कौन है ये तो ज़रा बता मुझ को

असलम आज़ाद

किश्त-ए-दिल वीराँ सही तुख़्म-ए-हवस बोया नहीं

असलम आज़ाद

अब और चलने का इस दिल में हौसला ही न था

असलम अंसारी

वहशत में सू-ए-दश्त जो ये आह ले गई

आसिफ़ुद्दौला

तालिब हो वहाँ आन के क्या कोई सनम का

आसिफ़ुद्दौला

हम ने क़िस्सा बहुत कहा दिल का

आसिफ़ुद्दौला

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