दिया Poetry (page 74)

आलम से बे-ख़बर भी हूँ आलम में भी हूँ मैं

असग़र गोंडवी

ज़ौक़-ए-सरमस्ती को महव-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया

असग़र गोंडवी

सिर्फ़ इक सोज़ तो मुझ में है मगर साज़ नहीं

असग़र गोंडवी

शिकवा न चाहिए कि तक़ाज़ा न चाहिए

असग़र गोंडवी

सामने उन के तड़प कर इस तरह फ़रियाद की

असग़र गोंडवी

पाता नहीं जो लज़्ज़त-ए-आह-ए-सहर को मैं

असग़र गोंडवी

न खुले उक़्दा-हा-ए-नाज़-ओ-नियाज़

असग़र गोंडवी

इश्क़ है इक कैफ़-ए-पिन्हानी मगर रंजूर है

असग़र गोंडवी

हुस्न को वुसअतें जो दीं इश्क़ को हौसला दिया

असग़र गोंडवी

गुम कर दिया है दीद ने यूँ सर-ब-सर मुझे

असग़र गोंडवी

आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया

असग़र गोंडवी

वो जो नहीं हैं बज़्म में बज़्म की शान भी नहीं

असर रामपुरी

कोई हमदम बना के देखो तुम

असर अकबराबादी

कोई दिल-जूई नहीं थी कोई शुनवाई न थी

असद जाफ़री

हालात ने किसी से जुदा कर दिया मुझे

असद भोपाली

जब ज़िंदगी सुकून से महरूम हो गई

असद भोपाली

ग़म-ए-हयात से जब वास्ता पड़ा होगा

असद भोपाली

ये लोग ख़्वाब बहुत कर्बला के देखते हैं

असअ'द बदायुनी

वो क़िस्सा-ए-दर्द-आगीं चुप कर दिया था जिस ने

आरज़ू लखनवी

पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह

आरज़ू लखनवी

नाले हैं दिलसिताँ तो फिर आहें हैं बर्छियाँ तो फिर

आरज़ू लखनवी

दोस्त ने दिल को तोड़ के नक़्श-ए-वफ़ा मिटा दिया

आरज़ू लखनवी

ये दास्तान-ए-दिल है क्या हो अदा ज़बाँ से

आरज़ू लखनवी

नज़र उस चश्म पे है जाम लिए बैठा हूँ

आरज़ू लखनवी

मुझ को दिल क़िस्मत ने उस को हुस्न-ए-ग़ारत-गर दिया

आरज़ू लखनवी

दिल दे रहा था जो उसे बे-दिल बना दिया

आरज़ू लखनवी

भोले बन कर हाल न पूछो बहते हैं अश्क तो बहने दो

आरज़ू लखनवी

निगाह-ए-शौक़ से कब तक मुक़ाबला करते

अर्शी भोपाली

नशीली छाँव में बीते हुए ज़मानों को

अर्शी भोपाली

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

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