दिया Poetry (page 70)

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

ये लोग जा के कटी बोगियों में बैठ गए

अज़हर फ़राग़

ये ए'तिमाद भी मेरा दिया हुआ है तुम्हें

अज़हर फ़राग़

एक होने की क़स्में खाई जाएँ

अज़हर फ़राग़

दलील उस के दरीचे की पेश की मैं ने

अज़हर फ़राग़

कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं

अज़हर फ़राग़

कैसे दुनिया का जाएज़ा किया जाए

अज़हर फ़राग़

जो ज़िंदगी की माँग सजाते रहे सदा

अज़हर अदीब

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी

आज़ाद गुलाटी

आप जिस रह-गुज़र-ए-दिल से कभी गुज़रे थे

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

किस ने सदा दी कौन आया है

आज़ाद गुलाटी

जो ग़म में जलते रहे उम्र-भर दिया बन कर

आज़ाद गुलाटी

गो मिरा साथ मिरी अपनी नज़र ने न दिया

आज़ाद गुलाटी

दिन में इस तरह मिरे दिल में समाया सूरज

आज़ाद गुलाटी

सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

घर दरवाज़े से दूरी पर सात समुंदर बीच

अय्यूब ख़ावर

हम चाहते थे माह-ए-दरख़्शाँ को देखना

आएशा मसूद मलिक

उस ने हमारे हाथ में इक हाथ क्या दिया

आएशा मसूद मलिक

पूछते हैं तुझ को सफ़्फ़ाकी कहाँ रह कर मिली

औरंगज़ेब

कैसा मंज़र गुज़रने वाला था

औरंगज़ेब

हवस ने मुझ से पूछा था तुम्हारा क्या इरादा है

औरंगज़ेब

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

शिकस्ता-दिल की ख़ुशी दोस्तो ख़ुशी तो न थी

औलाद अली रिज़वी

अभी तो काँटों-भरी झाड़ियों में अटका है

अतीक़ुल्लाह

हमारे मा-बैन

अतीक़ुल्लाह

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