दिया Poetry (page 68)

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है

ज़फ़र

भरी है दिल में जो हसरत कहूँ तो किस से कहूँ

ज़फ़र

किस को फ़ुर्सत कौन पढ़ेगा चेहरे जैसा सच्चा सच

बद्र वास्ती

बाग़-ए-दिल में कोई ग़ुंचा न खिला तेरे बा'द

बदनाम नज़र

जले हैं दिल न चराग़ों ने रौशनी की है

बदीउज़्ज़माँ ख़ावर

कुछ नहीं होता शब भर सोचों का सरमाया होता है

अज़रक़ अदीम

ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है

अज़रा वहीद

उस ने मेरे नाम सूरज चाँद तारे लिख दिया

अज़रा परवीन

बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा

अज़रा परवीन

जिला-वतन होने से पहले

अज़रा अब्बास

इस ज़िंदगी के बदले

अज़रा अब्बास

हाथ खोल दिए जाएँ

अज़रा अब्बास

एक नज़्म लिखना मुश्किल है

अज़रा अब्बास

अँधेरा

अज़रा अब्बास

आख़िरी रूसूमात के दौरान

अज़रा अब्बास

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

ज़ख़्म जो तुम ने दिया वो इस लिए रक्खा हरा

अज़्म शाकरी

मैं ने इक शहर हमेशा के लिए छोड़ दिया

अज़्म शाकरी

तीरगी में सुब्ह की तनवीर बन जाएँगे हम

अज़्म शाकरी

ख़ून आँसू बन गया आँखों में भर जाने के ब'अद

अज़्म शाकरी

अपने दुख-दर्द का अफ़्साना बना लाया हूँ

अज़्म शाकरी

वुसअत-ए-चश्म को अंदोह-ए-बसारत लिख्खा

अज़्म बहज़ाद

ये ख़ज़ाने का कोई साँप बना होता है

अज़लान शाह

समझ के रस्ता इधर से गुज़रने वालों ने

अज़लान शाह

मुराजअत

अज़ीज़ तमन्नाई

उसी ने साथ दिया ज़िंदगी की राहों में

अज़ीज़ तमन्नाई

वो एक राज़! जो मुद्दत से राज़ था ही नहीं

अज़ीज़ नबील

चाँद तारे इक दिया और रात का कोमल बदन

अज़ीज़ नबील

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