दुनिया Poetry (page 38)

ये इख़्लास-ए-गराँ-माया बहुत है

साहिर होशियारपुरी

वो जिस को हम ने अपनाया बहुत है

साहिर होशियारपुरी

शाम को सुब्ह अँधेरे को उजाला लिक्खें

साहिर होशियारपुरी

हम को मस्ती ओ ख़्वारी आई

साहिर होशियारपुरी

ग़म का सहरा न मिला दर्द का दरिया न मिला

साहिर होशियारपुरी

तक़वे के लिए जन्नत-ओ-कौसर हुए मख़्सूस

साहिर देहल्वी

रुस्वा-ए-इश्क़ में तिरा शैदा कहें जिसे

साहिर देहल्वी

रुस्वा-ए-इश्क़ है तिरा शैदा कहें जिसे

साहिर देहल्वी

काम इस दुनिया में आ कर हम ने क्या अच्छा किया

साहिर देहल्वी

ख़ुद को ख़ुद में तहलील करो

साहिल अहमद

पहले होता था बहुत अब कभी होता ही नहीं

साहिबा शहरयार

नींद इन आँखों में बन कर आए कोई

साहिबा शहरयार

मुझ को हर लम्हा नई एक कहानी देगा

साहिबा शहरयार

ख़्वाब देखूँ कोई महताब लब-ए-बाम उतरे

सहबा वहीद

एक इक से यही कहता हूँ बता मैं क्या हूँ

सहबा वहीद

हमें ख़बर है ज़न-ए-फ़ाहिशा है ये दुनिया

सहबा अख़्तर

अगर शुऊर न हो तो बहिश्त है दुनिया

सहबा अख़्तर

साँप सपेरा और मैं

सहबा अख़्तर

सवाल-ए-सुब्ह-ए-चमन ज़ुल्मत-ए-ख़िज़ाँ से उठा

सहबा अख़्तर

मुझे मिला वो बहारों की सरख़ुशी के साथ

सहबा अख़्तर

मुझ पे ऐसा कोई शे'र नाज़िल न हो

सहबा अख़्तर

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई

सहबा अख़्तर

असनाम-ए-माल-ओ-ज़र की परस्तिश सिखा गई

सहबा अख़्तर

देखी है मैं ने ये भी नैरंगी-ए-ज़माना

सहर महमूद

दास्ताँ क्या थी और क्या बना दी गई

सहर महमूद

दर्द की सूरत में वो उम्दा सा तोहफ़ा दे गया

सहर महमूद

बचपन की यादों को भुलाए एक ज़माना बीत गया

सहर महमूद

अँधेरे से ज़ियादा रौशनी तकलीफ़ देती है

सहर महमूद

कैसी कैसी महफ़िलें सूनी हुईं

सहर अंसारी

हम को जन्नत की फ़ज़ा से भी ज़ियादा है अज़ीज़

सहर अंसारी

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