हाथ Poetry (page 28)

दस्त-ए-दुआ को कासा-ए-साइल समझते हो

सलीम कौसर

मशवरा

सलीम फ़िगार

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

ख़ुशबू सा कोई दिन तो सितारा सी कोई शाम

सलीम फ़िगार

उसे ख़ुद को बदल लेना गवारा भी नहीं होता

सलीम फ़राज़

कम रंज मौसम-ए-गुल-ए-तर ने नहीं दिया

सलीम फ़राज़

शजर तो कब का कट के गिर चुका है

सलीम अंसारी

तिरे साँचे में ढलता जा रहा हूँ

सलीम अहमद

स्वाँग भरता हूँ तिरे शहर में सौदाई का

सलीम अहमद

कुछ हैं मंज़र हाल के कुछ ख़्वाब मुस्तक़बिल के हैं

सलीम अहमद

जंगली नाच

सलाम मछली शहरी

गुरेज़

सलाम मछली शहरी

रात कई दिनों से ग़ाएब थी

सलाहुद्दीन परवेज़

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

रुख़ हाथ पे रक्खा न करो वक़्त-ए-तकल्लुम

सख़ी लख़नवी

'सख़ी' से छूट कर जाएँगे घर आप

सख़ी लख़नवी

निस्बत वही माह-ए-आसमाँ से

सख़ी लख़नवी

घर में साक़ी-ए-मस्त के चल के

सख़ी लख़नवी

हमें तो हर्फ़-ए-तमन्ना ज़बाँ पे लाना है

सज्जाद सय्यद

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

सर से जुनून-ए-इश्क़ का सौदा निकालिए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मिरे सफ़र की हदें ख़त्म अब कहाँ होंगी

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मैं हम-नफ़साँ जिस्म हूँ वो जाँ की तरह था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

लफ़्ज़ जब कोई न हाथ आया मआनी के लिए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

क्या मिला ऐ ज़िंदगी क़ानून-ए-फ़ितरत से मुझे

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हमें चार सम्त की दौड़ में वही गर्द-ए-बाद-ए-सदा मिला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

फ़रेब था अक़्ल-ओ-आगही का कि मेरी फ़िक्र-ओ-नज़र का धोका

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दिल ख़ूँ हुआ है शोख़ी-ए-रंग-ए-हिना के साथ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अपने जीने को क्या पूछो सुब्ह भी गोया रात रही

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दिखाई देंगी सभी मुम्किनात काग़ज़ पर

सज्जाद बलूच

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