हुआ Poetry (page 85)

न जाने शेर में किस दर्द का हवाला था

सलीम अहमद

मुझ को दुश्वार हुआ जिस का नज़ारा तन्हा

सलीम अहमद

मजबूरियों का पास भी कुछ था वफ़ा के साथ

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

किसी दश्त का लब-ए-ख़ुश्क हूँ जो न पाए मुज़्दा-ए-आब तक

सलीम अहमद

ख़ुद अपनी लौ में था मेहराब-ए-जाँ में जलता था

सलीम अहमद

ख़ैर का तुझ को यक़ीं है और उस को शर का है

सलीम अहमद

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

हम हैं और राह-ए-कू-ए-बदनामी

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

बज़्म आख़िर हुई शम्ओं' का धुआँ बाक़ी है

सलीम अहमद

बैठे हैं सुनहरी कश्ती में और सामने नीला पानी है

सलीम अहमद

अहल-ए-दिल ने इश्क़ में चाहा था जैसा हो गया

सलीम अहमद

आँखों में सितारे से चमकते रहे ता-देर

सलीम अहमद

ताबानी-ए-रुख़ ले कर तुम सामने जब आए

सलाम संदेलवी

अजीब बात है मैं जब भी कुछ उदास हुआ

सलाम मछली शहरी

वो ज़िंदा है

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

पीतल का साँप

सलाम मछली शहरी

जंगली नाच

सलाम मछली शहरी

अंदेशा

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

फागुन

सलाहुद्दीन परवेज़

मिरी रात खो गई है किसी जागते बदन में

सलाहुद्दीन परवेज़

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

आवाज़ों से जिस्म हुआ नम

सलाहुद्दीन महमूद

आवाज़ों से जिस्म हुआ नम

सलाहुद्दीन महमूद

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