जान Poetry (page 54)

मय-कशो जान के लाले नज़र आते हैं मुझे

अक़ील शादाब

वो मक़्तल में अगर खींचे हुए तलवार बैठे हैं

अनवरी जहाँ बेगम हिजाब

मैं बज़्म-ए-तसव्वुर में उसे लाए हुए था

अनवर शऊर

बशारत हो कि अब मुझ सा कोई पागल न आएगा

अनवर शऊर

अपने लिए एक नौहा

अनवर सेन रॉय

जब फ़स्ल-ए-बहाराँ आती है शादाब गुलिस्ताँ होते हैं

अनवर सहारनपुरी

तसव्वुर के सहारे यूँ शब-ए-ग़म ख़त्म की मैं ने

अनवर साबरी

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ

अनवर जलालपुरी

'अनवर' ने बदले जान के ली जिंस-ए-दर्द-ए-दिल

अनवर देहलवी

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

सितम सहने की तय्यारी भी कोई चीज़ होती है

अनुभव गुप्ता

एक क़दीम ख़याली की निगरानी में

अंजुम सलीमी

दीवार पे रक्खा तो सितारे से उठाया

अंजुम सलीमी

आग बहते हुए पानी में लगाने आई

अंजुम रहबर

उस ने मजबूर-ए-वफ़ा जान के मुँह फेर लिया

अंजुम फ़ौक़ी बदायूनी

मुतमइन बैठा हूँ ख़ुद को जान कर

अंजुम फ़ौक़ी बदायूनी

ख़याल जान से बढ़ कर सफ़र में रहता है

अंजुम बाराबंकवी

ख़ाली भी तो कर ख़ाना-ए-दिल दुनिया से

अंजुम आज़मी

वा'दा है कि जब रोज़-ए-जज़ा आएगा

अंजुम आज़मी

मेरी दुनिया में अभी रक़्स-ए-शरर होता है

अंजुम आज़मी

अपनी जेब थी ख़ाली ख़ाली करते क्या

अंजुम अज़ीमाबादी

अनजाने ख़्वाब की ख़ातिर क्यूँ चैन गँवाया

अंजुम अंसारी

कब इश्क़ में यारों की पज़ीराई हुई है

अनीस अशफ़ाक़

भर नहीं पाया अभी तक ज़ख़्म-ए-कारी हाए हाए

अनीस अंसारी

कोई अदा-शनास-ए-मोहब्बत हमें बताए

अंदलीब शादानी

शम्अ' इक मोम के पैकर के सिवा कुछ भी न थी

आनंद नारायण मुल्ला

मोहिब्बान-ए-वतन का नारा

आनंद नारायण मुल्ला

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