जगह Poetry (page 2)

शाइर

ज़ीशान साहिल

शहरी सहूलतें

ज़ीशान साहिल

शायर

ज़ीशान साहिल

रंग

ज़ीशान साहिल

महमूद दरवेश के लिए ख़त

ज़ीशान साहिल

ख़ुद-कुशी

ज़ीशान साहिल

ख़त

ज़ीशान साहिल

जवाहर-लाल यूनवर्सिटी के तलबा के लिए

ज़ीशान साहिल

जंग के दिनों में

ज़ीशान साहिल

जगह

ज़ीशान साहिल

हल्की और भारी चीज़ें

ज़ीशान साहिल

फ़ुट-पाथ के लोग

ज़ीशान साहिल

चीज़ें अपनी जगह तब्दील करना चाहती हैं

ज़ीशान साहिल

बच्चों की साइकल

ज़ीशान साहिल

अगर आप

ज़ीशान साहिल

आँसू की वजह

ज़ीशान साहिल

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ज़ीशान साहिल

क्यूँ हो न गिर के कासा-ए-तदबीर पाश पाश

ज़ेबा

मिरी जगह कोई आईना रख लिया होता

ज़ेब ग़ौरी

रात दमकती है रह रह कर मद्धम सी

ज़ेब ग़ौरी

मैं छू सकूँ तुझे मेरा ख़याल-ए-ख़ाम है क्या

ज़ेब ग़ौरी

लगाऊँ हाथ तुझे ये ख़याल-ए-ख़ाम है क्या

ज़ेब ग़ौरी

बहार कौन सी तुझ में जमाल-ए-यार न थी

ज़ेब ग़ौरी

तमन्ना है किसी की तेग़ हो और अपनी गर्दन हो

ज़रीफ़ लखनवी

क़ैस कहता था यही फ़िक्र है दिन-रात मुझे

ज़रीफ़ लखनवी

इल्म में झींगर से बढ़ कर कामराँ कोई नहीं

ज़रीफ़ लखनवी

मेरे ख़्वाबों का कभी जब आसमाँ रौशन हुआ

ज़की तारिक़

मंज़िल जिसे समझते थे यारान-ए-क़ाफ़िला

ज़की काकोरवी

ऐ दिल तिरी आहों में इतना तो असर आए

ज़की काकोरवी

रखी न गई दिल में कोई बात छुपा कर

ज़हरा क़रार

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