चलो Poetry (page 4)

तिरी याद जो मेरे दिल में है बस उसी की जल्वागरी रही

सूफ़िया अनजुम ताज

तुम आसमाँ की तरफ़ न देखो

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

वो हुस्न को जल्वा-गर करेंगे

सूफ़ी तबस्सुम

सुकून-ए-क़ल्ब ओ शकेब-ए-नज़र की बात करो

सूफ़ी तबस्सुम

मोहब्बत किस क़दर सेहर-आफ़रीं मालूम होती है

सूफ़ी तबस्सुम

बुझी बुझी सी सितारों की रौशनी है अभी

सूफ़ी तबस्सुम

यौम-ए-आज़ादी

सिराज लखनवी

गुनाहगार हूँ ऐसा रह-ए-नजात में हूँ

सिराज लखनवी

बे-समझे-बूझे मोहब्बत की इक काफ़िर ने ईमान लिया

सिराज लखनवी

ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही

सिराज औरंगाबादी

चराग़-ए-मह सीं रौशन-तर है हुस्न-ए-बे-मिसाल उस का

सिराज औरंगाबादी

हज़ार नक़्स हैं मुझ में मिरे कमाल को देख

सिकंदर अली वज्द

बुल-हवस में भी न था वो बुत भी हरजाई न था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

अबस है दूरी का उस के शिकवा बग़ल में अपने वो दिल-रुबा है

श्याम सुंदर लाल बर्क़

दिल की बिसात क्या थी जो सर्फ़-ए-फ़ुग़ाँ रहा

शोला अलीगढ़ी

हुआ जब जल्वा-आरा आप का ज़ौक़-ए-ख़ुद-आराई

शिव रतन लाल बर्क़ पूंछवी

मुझ को कहाँ ये होश तिरी जल्वा-गाह में

शिव दयाल सहाब

अंदोह-ए-बेश-ओ-कम न ग़म-ए-ख़ैर-ओ-शर में है

शिव दयाल सहाब

अदल-ए-जहाँगीरी

शिबली नोमानी

ग़ज़ब है जुस्तजू-ए-दिल का ये अंजाम हो जाए

शेरी भोपाली

वो जब तक अंजुमन में जल्वा फ़रमाने नहीं आते

शेर सिंह नाज़ देहलवी

बातों में ढूँडते हैं वो पहलू मलाल का

शेर सिंह नाज़ देहलवी

बातों में ढूँडते हैं वो पहलू मलाल का

शेर सिंह नाज़ देहलवी

दिल के आईने में नित जल्वा-कुनाँ रहता है

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

आलम में हुस्न तेरा मशहूर जानते हैं

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

ज़ौक़

था ग़ैर का जो रंज-ए-जुदाई तमाम शब

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

रोज़ ख़ूँ होते हैं दो-चार तिरे कूचे में

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

दिल का गिला फ़लक की शिकायत यहाँ नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

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