जिन्न Poetry (page 10)

एक रात आप ने उम्मीद पे क्या रक्खा है

शाज़ तमकनत

मारे ग़ुस्से के ग़ज़ब की ताब रुख़्सारों में है

शौक़ क़िदवाई

दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था

शौक़ क़िदवाई

बाक़ी न रहे होश जुनूँ ऐसा हुआ तेज़

शौक़ माहरी

इन ही का नाम मोहब्बत इन ही का नाम जुनूँ

शौकत थानवी

हो राहज़न की हिदायत कि राहबर के फ़रेब

शौकत थानवी

शिद्दत-ए-दर्द-ए-जिगर हो ये ज़रूरी तो नहीं

शातिर हकीमी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

तरह तरह से मिरा दिल बढ़ाया जाता है

शारिक़ कैफ़ी

रात बे-पर्दा सी लगती है मुझे

शारिक़ कैफ़ी

होने से मिरे फ़र्क़ ही पड़ता था भला क्या

शारिक़ कैफ़ी

बरसों जुनूँ सहरा सहरा भटकाता है

शारिक़ कैफ़ी

तिश्ना-लब कोई जो सर-गश्ता सराबों में रहा

शरर फ़तेह पुरी

रिंदों को तिरे आरज़ू-ए-ख़ुश्क-लबी है

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

आब ओ गिया से बे-नियाज़ सर्द जबीन-ए-कोह पर

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

वो अक्स मुझ में जुनूँ-साज़ रक़्स करने लगा

शमशीर हैदर

ख़लिश हो जिस में वो अरमाँ तलाश करता हूँ

शम्स इटावी

ये घर जो हमारे लिए अब दश्त-ए-जुनूँ है

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

न कोई अपना ग़म है और न अब कोई ख़ुशी अपनी

शम्स फ़र्रुख़ाबादी

सराबों का सफ़र

शमीम क़ासमी

खंडर

शमीम करहानी

याद की सुब्ह ढल गई शौक़ की शाम हो गई

शमीम करहानी

वो जुनूँ के अहद की चाँदनी ये गहन गहन की उदासियाँ

शमीम करहानी

मुझे दैर से तअल्लुक़ न हरम से आश्नाई

शमीम करहानी

ख़ुद कोई चाक-गरेबाँ है रग-ए-जाँ के क़रीब

शमीम करहानी

जुनूँ तो है मगर आओ जुनूँ में खो जाएँ

शमीम करहानी

जो देखते हुए नक़्श-ए-क़दम गए होंगे

शमीम करहानी

गुलों पे साया-ए-ग़म-हा-ए-रोज़गार मिले

शमीम करहानी

साहिल पे लाई और सफ़ीने डुबो दिए

शमीम जयपुरी

सफ़ीना वो कभी शायान-ए-साहिल हो नहीं सकता

शमीम जयपुरी

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