जिगर Poetry (page 8)

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

जूँ क़दम यार ने घर से मिरे दर पर रक्खा

शाह कमालउद्दीन कमाल

शक्ल-ए-जानाना जा-ब-जा हैं हम

शाह आसिम

इश्क़ के अक़्लीम में चाल-ओ-चलन कुछ और है

शाह आसिम

सरों पे साया ग़ुबार-ए-सफ़र के जैसा है

शफ़क़ सुपुरी

डूबने वाला क्या न कर डूबे

शफ़क़ सुपुरी

इश्क़ में ज़ोर उम्र-भर मारा

शाद लखनवी

हस्ती-ओ-अदम में नफ़स-ए-चंद बशर के

शाद लखनवी

दुखा दिल भी टुकड़े जिगर होते होते

शाद लखनवी

दिल की कहूँ या कहूँ जिगर की

शाद लखनवी

अब्र-ए-दीदा का मिरे हो जो न ओझढ़ पानी

शाद लखनवी

अब भी इक उम्र पे जीने का न अंदाज़ आया

शाद अज़ीमाबादी

कभी भूल कर भी न बात की मुझे दिल से ऐसा भुला दिया

शबाब

तारे जो आसमाँ से गिरे ख़ाक हो गए

शाद आरफ़ी

अहद-ए-मायूसी जहाँ तक साज़गार आता गया

शाद आरफ़ी

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद उस ने अदा किया ये हक़

सेहर इश्क़ाबादी

यही ठहरा कि अब उस ओर जाना भी नहीं है

सीमाब ज़फ़र

ख़िरद के जुमला दसातीर से मुकरते हुए

सीमाब ज़फ़र

सूरज की तपती धूप ने मारा है इन दिनों

सीमा शर्मा मेरठी

लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-अलम ही से सुकूँ आ जाए है

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

किसी को कुछ नहीं मिलता है आरज़ू के बग़ैर

सय्यद ज़िया अल्वी

इक चराग़-ए-दिल फ़क़त रौशन अगर मेरा भी है

सौरभ शेखर

मगर वो दीद को आया था बाग़ में गुल के

मोहम्मद रफ़ी सौदा

कीजिए न असीरी में अगर ज़ब्त नफ़स को

मोहम्मद रफ़ी सौदा

कहते हैं लोग यार का अबरू फड़क गया

मोहम्मद रफ़ी सौदा

गुल फेंके है औरों की तरफ़ बल्कि समर भी

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दिल में तिरे जो कोई घर कर गया

मोहम्मद रफ़ी सौदा

दामन सबा न छू सके जिस शह-सवार का

मोहम्मद रफ़ी सौदा

बुलबुल ने जिसे जा के गुलिस्तान में देखा

मोहम्मद रफ़ी सौदा

वाक़िफ़ थे कहाँ हम दिल-ए-ना-चार से पहले

सरवर आलम राज़

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